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Wednesday, June 9, 2021

Santosh Pathak : List of Novels

1 andekha khatra (अनदेखा खतरा)

2 akhri Shikar (आखिरी शिकार)

3 khatarnak sajish (खतरनाक साज़िश)

4 maut ki dustak (मौत की दस्तक)

5 katl ki paheli (कत्ल की पहेली)

6 10 June ki raat ( दस जून की रात)

7 hairatangej hatya (हैरतअंगेज हत्या)

8 kohima conspiracy (कोहिमा कॉन्सपिरेसी)

9 trap (ट्रैप)

10 catch me if you can (कैच मी इफ यू कैन)

11 murder in lockdown (मर्डर इन लोकड़ाउन)

12 the silent murder (द साइलेंट मर्डर)

13 inside job (इनसाइड जॉब)

14 Tandav (तांडव)

15 Prachand (प्रचण्ड)

16 Maya mi na ram (माया मिली न राम)

17 Vinash kaale (विनाशकाले)

18 Chalava (छलावा)

19 Jab nash manuj pe chaata hai (जब नाश मनुज पर छाता है)

20 Watchman secret of missing girl (सीक्रेट ऑफ मिसिंग गर्ल)

21 Watchman murder in room 108 (मर्डर इन रूम 108)

22 Pratighaat (प्रतिघात)

23 Right time to kill (राइट टाइम टू किल)

24 Swaaha (स्वाहा)

25 Dedh Shyaane (डेढ़ श्याने)

26 Swaha part-2

27 Swaha part-3

28 Andher nagri (अंधेर नगरी)

29. Kaun (कौन)

30. Kambakht (कमबख्त)

31. Gaddar (गद्दार)

32. Beat (बीट)

33. The scripted murder (द स्क्रिप्टेड मर्डर)

34. The perfect murder (द परफेक्ट मर्डर)

35. Nishachar (निशाचर)

36. Gunah Belazzat (गुनाह बेलज़्ज़त)










Wednesday, September 23, 2020

Santosh Pathak : 10 June ki Raat

 उपन्यास : दस जून की रात 

लेखक :संतोष पाठक 
श्रेणी : थ्रिलर 
प्रकाशक : सूरज पॉकेट बुक्स, ठाणे , महाराष्ट्र। 
मूल्य : 280/-
पृष्ठ संख्या : 230 

दस जून की रात 


सबसे पहले तो एक डिस्क्लेमर सबके समक्ष रखना चाहूंगा कि मैं कोई सर्टिफाइड समीक्षक नहीं हूँ  और इस  ब्लॉग पर मैं जो किताब अपनी खून पसीने की कमाई से खरीदता हूँ  उसके बारे मैं निष्पक्ष राय रखने की कोशिश करता हूँ जितना मैं समझ पाता हूँ और आप मेरी राय से इत्तेफाक रखें ये जरुरी तो नहीं, पर हम बात तो कर ही सकते हैं पुस्तकों के बारे में।

  यहां मैं श्री संतोष पाठक द्वारा लिखे गए उपन्यास दस जून की रात के बारे मैं, जो मैंने अभी अभी पढ़ा है, के बारे मैं बात करना चाहूंगा। सूरज पॉकेट बुक्स के नए नवेले सेट में यह उपन्यास प्रकाशित हुआ है और ये बात मुझे एक बार फिर माननी पड़ेगी की उपन्यास को एक बेहतर एवं स्तरीय साज सज्जा के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत किया गया है।  आवरण पृष्ठ पर  कार्टून टाइप के चरित्र चित्रण से बचकर एक रहस्य्मयी रात का सन्नाटा दिखता हुआ कलेवर है जो उपन्यास के नाम से मेल खाता हुआ है। सूरज पॉकेट बुक्स ने रहस्य रोमांच और अपराध को अपना जॉनर चुना है और इस विधा की पुस्तकों को लुगदी प्रकाशन के अभिशाप से छुटकारा दिलाकर उच्च क्वालिटी के कागज पर छपी पुस्तके अब पाठकों तक पहुंचने का जिम्मा सफलता पूर्वक निभाया है। इस प्रयास में यह प्रकाशन इंग्लिश भाषा में इसी जॉनर की पुस्तकों को प्रकाशित करने वाले कई नामचीन प्रकाशकों से इक्कीस ही है कमतर तो बिलकुल भी नहीं।

        संतोष पाठक ने यह उपन्यास थ्रिलर उपन्यास के रूप में  लिखा है जिसमे आपको उनके रचे गए पात्र प्राइवेट जासूस विक्रांत गोखले या खोजी पत्रकार आशीष गौतम के दर्शन नहीं होंगे। यही इस उपन्यास की खास बात है। इससे पहले के संतोष पाठक के  उपन्यासों में मनोरंजक उपन्यास जगत के वट वृक्ष शक्शियत सुरेंदर मोहन पाठक की झलक साफ़ नजर आती थीऔर इस बात को संतोष पाठक ने ईमानदारी से स्वीकार भी किया है। । इससे पहले के उपन्यास क़त्ल का पहेली में संतोष पाठक ने आपकी अलग जमीं खोजने की शुरुआत कर दी थी और प्रस्तुत उपन्यास दस जून की रात में  यकीनी तौर पर उन्होंने उस प्रभाव से मुक्त होने में  सफलता प्राप्त की है।

             दस जून की रात  इंस्पेक्टर सतपाल सिंह के लिए क़यामत की रात साबित होती है  वो इसलिए कि पुलिसिया रोब मे वो अनजाने में एकऐसे शक्स  को एक लाश की शिनाख्त के लिए बुला बैठता है जो एक पनौती  है!!!!! जी हाँ !!!! पनोती !!! यही नाम है इस उपन्यास के नायक विशाल सक्सेना का जो उसके करीबी  लोगों ने दिया है।  विशाल सक्सेना एक पच्चीस साल का युवक है जिसके सर से बाप का साया उठने के बाद उसकी मां  ने उसका पालन पोषण  नौकरी करते हुए किया है। विशाल क्रिमिनोलॉजी  और पुलिस एडमिनिस्ट्रेशन में पोस्ट ग्रेजुएट है , बॉक्सिंग और निशानेबाजी का चैंपियन है।
 संतोष पाठक ने एक ऐसा चरित्र गढ़ा है जो दो विपरीत ध्रुवों का संगम है। वह बुद्धिमान होते हुए अहमक हो  सकता है और अहमकाना हरकत करते हुए निहायत चतुराई से दूसरे को गच्चा भी दे सकता है। पढ़ा लिखा पर बेतरतीब मस्त मौला है  परन्तु दूसरों के लिए है पनौती। इंस्पेक्टर सतपाल खुद कबूल करता है कि "सच तो ये है कि मैंने इसके जैसा सीधा सादा , मक्कार ,कुशाग्र बुद्धि वाला बेवकूफ , नर्मदिल बेरहम , किस्मत वाला बदकिस्मत आदमी ताजिंदगी  नहीं देखा।''
इस पनौती को बुला बैठता है इंस्पेक्टर सतपाल सिंह। जो रात विशाल को उसके जीवनसाथी संजना कुलकर्णी से मिलवाने वाली  थी उसी रात को विशाल का सामना होता है एक लड़की की लाश से जिसे विशाल उर्फ़ पनोती नहीं जानता और पुलिस कहती है कि लड़की उसकी जानकार है क्योंकि लड़की ने मरने से पहले पनौती को कई बार फ़ोन किये थे। यहीं जो कहानी रफ्तार पकड़ती है तो रुकने का नाम नहीं लेती।
कहानी में बड़े रोचक मोड़ हैं और खतरनाक भी इतने हैं कि इंस्पेक्टर सतपाल खुद सलाखों के पीछे पहुँच जाता है और इल्जाम होता है  स्थानीय बाहुबली महावीर सिंह के एक विश्वास पात्र  प्यादे के खून का।  इसी घटना क्रम में फरीदाबाद की पुलिस होती है अपने नायक पनोती  उर्फ़ विशाल के पीछे जो हर हाल मैं उसे पकड़ना चाहती है । फिर शुरू होता है घाट और प्रतिघात का सिलसिला जिसमे पनौती की जान पर बन आती है। पनोती को अब कातिल भी खोजना है , अपनी जान भी बचानी है और इंस्पेक्टर सतपाल सिंह के साथ वो जिस बर्र के छत्ते में हाथ दे बैठता है उससे निपटना भी है।
                दस जून की रात एक मर्डर निस्ट्री तो है ही साथ में एक एक्शन पैक्ड थ्रिलर भी है।  बहुत दिनों के बाद कोई ऐसा उपन्यास हाथ में आया जिसके चरित्र साकार  होकर आपके साथ चलने लगे हो। प्रत्येक चरित्र को संतोष पाठक एक अलग रंग में रंगने में कामयाब रहे है चाहे वो निक्की हो या नेहा, संजना हो या आशा। मुश्ताक , विक्रम सैनी, ओमकार सिंह, इंस्पेक्टर राघव सब अपनी जगह जमे हैं यहाँ तक कि पनौती की दोस्त सुचित्रा अपने चुलबुलेपन की छाप छोड़ जाती है।   उम्मीद है यह से उपन्यासकार संतोष पाठक का  वो सफर शुरू होगा जिसकी उनके पाठकों को आस है। उनका  यह चरित्र विशाल सक्सेना उर्फ़ पनौती आगे आने वाले समय में हो सकता है ऐसे लोगों को इन्साफ दिलाने वाला हो जो आम जान जीवन से आते है और अपराध जगत से जिनका कोई वास्ता न हो। 
 इस उपन्यास का नायक विशाल सक्सेना आम अदना सा नागरिक है लेकिन एकदम से वायलेंट हो कर कानून को  अपने हाथ में लेना अखरता है और उसके द्वारा काम जिस परिस्थतियों में हुए हैं तत्कालीन रूप से सहीं लग सकते हैं पर न्यायोचित हैं या नहीं इस विमर्श से संतोष पाठक जी ने परहेज किया है। उनके दूसरे उपन्यासों के मुकाबले दस जून की रात में पनौती द्वारा इस्तेमाल की गयी भाषा संयमित और मर्यादा की सीमा में है जो इस किताब का प्लस पॉइंट है और सुरेंदर मोहन पाठक की छाया  से कुछ हद तक उनको दूर करने में कामयाब रहा है। 
   कुल मिला कर उपन्यास रोचक और पाठकों की कसौटी पर जिसकी खरा उतरने की प्रबल सम्भावनाहै और संग्रहणीय श्रेणी का स्तर है।
मेरी नजर में उपन्यास की रेटिंग ★★★★★/★★★★★

निम्न लिंक से आप उपन्यास खरीद  सकते हैं।
1)   https://www.amazon.in/Dus-June-Raat-Santosh-Pathak/dp/9388094204/ref=sr_1_1?ie=UTF8&qid=1551433515&sr=8-1&keywords=santosh+pathak+hindi+novel
2 ) http://www.soorajbooks.com/product/dus-june-ki-raat/
Santosh Pathak

Qatl ki paheli (कत्ल की पहेली) : Santosh Pathak

 The book under review and 1st of 2019 is Qatl ki Paheli  by Santosh Pathak (you can say the mystery of a murder). The main protagonist of the novel is Vikrant Gokhale who is on a mission for his client Sahil Bhagat but circumstances changes adversely and Sahil Bhagat lands into jail for murdering his wife as he caught on spot by police. A watertight case is registered against Sahil Bhagat and Vikrant Gokhale faces a huge and Uphill task to save his client. In this context Vikrant Gokhale comes in contact with various characters and story and Plot becomes more murkier and complex as the story progress forward. A spree of Murder happens where Murderer leaves no clues for Vikrant Gokhale. As the novel is a murder mystery so it is not appropriate for me to elaborate the story further. The story has inspector Chauhan and a lawyer Neelam Tomar who are on the side of Vikram Gokhale and have their own views about the proceedings.

The  publisher of the book is Suraj Pocket Books who has successfully presented in nice package but have some proof errors which can be avoided. 
As far as Santosh Pathak, who is author of many mystery books including Aakhri Shikar, Maut ki dastak, khatarnaak Sajish and Andekha Khatra is concerned, is successful in creating a mysterious murder mystery. The story line of Qatl ki Paheli is so complicated that in the last Vikram Gokhale is also puzzled along with inspector Chauhan to solve the issue. The author is rightly says that you cannot find out the culprit till the end of the novel because there are so many subplots and so many motives which aur intelligently interwoven to create a well knit and  interesting story.
The characterization of Vikrant Gokhale remind us private detective Sudhir Kohli of Surendra Mohan Pathak as Santosh Pathak admits himself that he is largely inspired by Surendra Mohan Pathak, the iconic great story teller of Indian Pulp Fiction. Surendra Mohan Pathak has played a great great role in refining the taste and standard of readers of Pulp Fiction based on which the writers like Chetan Bhagat, Ashwin Sanghi, Ravi Subramanian, Mukul Deva and Vish dhamija are creating new frontiers of popular or you can say Pulp Fiction. A great League of new and aspiring writers like Santosh Pathak Vikram E Diwan Kanval Sharma are taking forward  the torch lightened by the authors like Ved Prakash Sharma and Surendra Mohan Pathak.
Santosh Pathak as shown the great ability to write in detail the conversation between his characters. He could have taken care of using the Tu-Tadaak language between Vikram Gokhale and Neelam Tomar or between Vikram Gokhale and Inspector Chauhan. He can use the world Tum instead of Tu because it will lend some respectibility to the characters. 
In future the Vikram Gokhale should be either completely corrupt morally or more responsible like Sunil because in this novel he is verbally sounds like Sudhir of SMP but in the end act like Sunil where he returns the flat to it's owner. Here I believe that he should be either white or completely black as the grey shaded character will be difficult to be justified as there is an instant smooching incident between Vikram Gokhale and Meeta in laters flat. 
Although Qaitl ki Paheli is a murder mystery where we are dealing with the peoples suffering from lust and greed but author in my view should show some restrain to portray every woman as eager to oblige his private detective. Apart from that Vikram Gokhale is an enduring, courageous and fully devoted to his duty and looks more mortal then is others contemporaries in detective field.
Santosh Pathak ji will surely produce another Ace in future which will be starkly different from his previous works which we are eagerly waiting.

Friday, September 11, 2020

Santosh Pathak-The Silent Murder (द साइलेंट मर्डर)

उपन्यास का नाम:  द साइलेंट मर्डर  
उपन्यासकार का नाम:  संतोष पाठक  
पब्लिकेशन:  थ्रिल वर्ल्ड 
पृष्ठ संख्या : 226 
मूल्य : 230/-  
ASIN नंबर: ASIN : B08CSK823D
अमेजॉन लिंक :द साइलेंट मर्डर


"वह दूसरा बंगला रमेश भण्डारी ने हाल ही में अपनी पुरसुकून जिंदगी और तन्हा रहने की फितरत के मद्देनजर खरीदा था । बाद में दोनों बंगलों के बीच की बाउंड्री को तोड़कर उन्हें आपस में यूं जोड़ दिया गया कि बाहर से देखने पर वह अब दो की बजाय एक नजर आते थे ....... वह साठ के पेटे में पहुंचा, नाजुक तंदरुस्ती वाला खूब लंबा चौड़ा शख्श था, जिसे बीपी से लेकर शुगर तक ! बस समस्या ही समस्या थी । दो बार दिल का दौरा पड़ चुका था, ऐसे में उसकी कभी भी चल-चल हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी ।" ( पृष्ठ 9-10)
    
"द साइलेंट मर्डर" संतोष पाठक जी का लिखा हुआ एक नवीनतम उपन्यास है। यह उपन्यास "आशीष गौतम सीरीज" का उपन्यास है । कोरोना कॉल में संतोष पाठक जी ने अपने पाठकों को एक के बाद एक बेहतरीन तोहफा दिया है। यह उपन्यास एक Who Done It किस्म का उपन्यास है। इस उपन्यास में पत्रकार आशीष गौतम की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।

कहानी:-
कहानी की शुरुआत में एक धनाड्य व्यक्ति रमेश भंडारी की नौकरानी कोमल सामंता सुबह उसके घर में नाश्ता देने के लिए जाती है । रमेश भण्डारी द्वारा कोई जवाब ना मिलने पर उसे किसी अनहोनी की आशंका होती है । वह उसके परिवार वालों को बुलाती है। उसके पुत्र प्रकाश और अविनाश पुलिस को सूचना देते हैं और पुलिस इंस्पेक्टर सुधीर राय के आने पर सब इंस्पेक्टर अनिल रावत मकान का या कहें उस कमरे का दरवाजा बड़ी मुश्किल से तोड़ा जाता है । कमरे के अंदर धनकुबेर रमेश भंडारी मृत पाया जाता है।
 
उसकी मेडिकल हिस्ट्री के अनुसार वह हार्ट पेशेंट था और सभी यही मानते हैं कि रात को किसी वजह से उस व्यक्ति को हार्ट-अटैक आया होगा और उसने अपने परिवार से सहायता मांगने की कोशिश की होगी लेकिन अंधेरे और हार्ट-अटैक के दर्द की वजह से वो उसमें कामयाब नहीं हो पाया था। इंस्पेक्टर  सुधीर इसे एक सीधी-सादी हार्ट अटैक से हुई मौत की संज्ञा देता है। लेकिन तब इस कहानी में पदार्पण होता है। आशीष गौतम का और वह जब इस बारे में तहकीकात करनी शुरु करता है तो उसे शक होता है कि रमेश भण्डारी अपनी आई मौत नहीं मरा था, बल्कि उसे किसी ने जबरन रुखसत कर दिया था। आशीष गौतम के सद्के रमेश भण्डारी का दोबारा पोस्टमार्टम होता है ।उसके बाद रहस्य की परतें परत दर परत खुलती चली जाती हैं और फिर यह सीधी-सादी मौत एक साइलेंट मर्डर का केस लगना शुरू हो जाती है । अपनी तहकीकात पूरी करते हुए आशीष अंत में इस केस को सुलझाने में कामयाब रहता है।

महत्वपूर्ण पात्र:- 

 इस कहानी के अंदर रमेश भंडारी के अलावा कुछ और अहम पात्र हैं जो पूरी कहानी में आपके साथ रहते हैं । जिसमें रमेश भंडारी के दोनों पुत्र अविनाश और प्रकाश, उसका दामाद रवि कांत, डॉक्टर अनिल अस्थाना, फोरेंसिक एक्सपर्ट पावन मिश्रा,  वकील हरिदास गोस्वामी,  विधायक महिपाल सिंह, विधायक का पुत्र विप्लव सिंह, पुलिस इंस्पेक्टर सुधीर राय  और उसका सहायक अनिल रावत, मेड कोमल सामंता, राम परसाद, असगर अहमद और अनिल त्रिपाठी  । 

आशीष गौतम की तहकीकात उपन्यास में उपस्थित प्रत्येक पात्र की जांच पड़ताल करती है, जिसमें उसका मुख्य फोकस अविनाश, रविकांत और प्रकाश पर रहता है साथ में उसके शक के दायरे में है विप्लव सिंह ।  संतोष पाठक जी ने इस कहानी में एक मेडिकल ट्विस्ट भी डाला है जो पाठकों को पसंद आएगा। कहानी के बारे में हम ज्यादा बातें नहीं करते हैं क्योंकि यह एक सपोइलर के रूप में कार्य कर सकता है। अतः आखिर में गुनहगार कौन है यह आप उपन्यास पढ़ कर ही पता लगाएं तो ज्यादा मुनासिब रहेगा ।

मेरी राय:-
अब हम इस उपन्यास के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर बात करते हैं :
 
1) सबसे पहले इस उपन्यास की साज-सज्जा।  यह उपन्यास व्हाइट पेपर में और एक आकर्षक मुखपृष्ठ के साथ थ्रिल वर्ल्ड पब्लिकेशन ने छापा है। पेपर क्वालिटी और प्रिंटिंग अव्वल दर्जे की है जो  पाठकों के लिए बहुत हर्ष का विषय हो सकते हैं। 

 2) संतोष पाठक जी की लेखनी दिन प्रतिदिन और सुदृढ़ होती जा रही है । कहानी, चरित्र चित्रण और घटनाक्रम पर संतोष पाठक जी की मजबूत पकड़ है। अब उनके चरित्र पाठकों के दिमाग में अपनी अलग अलग छवि बना लेते हैं, जिससे कहानी का मजा दुगना हो जाता है।

3) अश्लीलता और गाली गलौज की भाषा से उन्होंने इस उपन्यास को पूर्ण रूप से मुक्त रखा है।

पर इस उपन्यास में कुछ ऐसी बातें हैं खटकती भी हैं कि जैसे मकतूल रमेश भंडारी का विधायक महिपाल के नौकरों के नाम पर बेनामी संपत्ति लेना। क्योंकि पाठक जी ने यह चित्रित किया है कि विधायक महिपाल और रमेश भंडारी की आपस में नहीं बनती है । उनका उस घर को लेकर के विवाद था या मनमुटाव है जिसमें भंडारी मृत पाया जाता है। उसी महिपाल सिंह के नौकरों के नाम पर कोई व्यक्ति बेनामी संपत्ति क्यों खरीदेगा? क्या उसे पता नहीं कि यह दोनों नौकर महिपाल सिंह के हैं?  वह इस संपत्ति के सौदों के लिए अपने दामाद रवि कांत पर भरोसा करता है,  जिसे वह पसंद नहीं करता । यह मुझे थोड़ा अटपटा लगा,क्योंकि संपत्ति की खरीद में हम आम तौर पर अपने विश्वासपात्र लोगों से ही बात करते हैं ।
दूसरा जो पॉइंट है कि स्ट्रॉ का उनके घर के भीतर बाउंड्री के अंदर मिलना । यह कथाकार की अपनी सुविधा हो सकती है कि वह अपने घटनाक्रम को किस प्रकार दिखाता है और चीजों को कैसे बरामद होता हुआ दिखाता है, लेकिन इस बात की जस्टिफिकेशन हमें नहीं मिलती। अगर गली में ही मिलता तो क्या आशीष का ध्यान खींचने में कामयाब होता? 
अगर पूरे उपन्यास के कथानक पर बात की जाय तो मेरी राय में यह एक पठनीय उपन्यास है। कहानी का नायक आशीष गौतम 'खबरदार' अखबार में चीफ रिपोर्टर है। कहानी एक स्थापित ढर्रे पर चलती प्रतीत होती है। फिर भी संतोष जी शुरू से ही इसमें रोचकता बनाये रखने में कामयाब रहे हैं।

अगर हम उपन्यास को पूर्ण रूप से देखें तो एक मनोरंजक उपन्यास संतोष पाठक जी ने प्रस्तुत किया है जिसे उनके पाठक भरपूर पसंद करेंगे । 

 

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