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Friday, September 24, 2021

My first murder case : Jaydev Chavria

उपन्यास : माय फ़र्स्ट मर्डर केस
लेखक : जयदेव चावरिया
प्रकाशक: बूकेमिस्ट (सूरज पॉकेट बुक्स की सहयोगी संस्था)
पृष्ठ संख्या: 152
मूल्य: 220/- (MRP) डिस्काउंट पर उपलब्ध 
पुस्तक मिलने का स्थान : सूरज पॉकेट बुक्स  के स्टोर पर (online) और amazon पर 

'माय फ़र्स्ट मर्डर केस' श्री जयदेव चावरिया का लिखा हुआ पहला उपन्यास है जिसे सूरज पॉकेट बुक्स की सहयोगी संस्था 'बूकेमिस्ट' के बैनर तले प्रकाशित किया गया है । जयदेव जी ने अपने लेखकीय में बताया है कि किस तरह से उनके परिवार से ही पठन -पाठन का शौक उन तक पहुंचा । वह कहते हैं कि लगभग एक दशक तक उन्होने पाठक के तौर पर विभिन्न लेखकों के उपन्यास पढे और उनका प्रभाव उन पर पड़ा । 
यदि कोई पाठक लंबे समय तक पढ़ता रहे तो उसके मन में कभी न कभी कुछ लिखने का ख्याल आ ही जाता है । जो व्यक्ति अपने आसपास की एवं स्वयं की वर्जनाओं को तोड़कर अपने स्वप्न को साकार करने की ठान लेता है तो वह अवश्य ही अपने मकसद में कामयाब होता है । जयदेव जी ने जैसे कि बताया भी है कि उनका एक व्हाटसएप ग्रुप है 'उपन्यास के दीवाने' जिसमें उपन्यासों की समीक्षा और बातें चलती रहती हैं । मैं स्वयं भी उस ग्रुप में सम्मिलित हूँ । उसी ग्रुप से प्रेरणा पाकर जयदेव जी ने अपने उपन्यास को पूरा करने की ठानी जिसमें वो कामयाब हुए हैं ।

My First Murder Case


माय फ़र्स्ट मर्डर केस :-
उपन्यास के पात्र: :
अशोक नन्दा, बलवंत नन्दा, विनय नन्दा,रॉकी, पूर्वी, ललिता, साक्षी, मोहिनी, जूली, घनश्याम, गणेश दत्त, इंस्पेक्टर नवनीश, जयदेव, अलीभाई, सोमदत्त इत्यादि ।

कथानक : 
उपन्यास की शुरुआत जूली और रॉकी की मुलाक़ात से होती है । राजनगर के ज्यूलरी शॉप के मालिक अशोक नन्दा का उसके घर में ही सोते हुए कत्ल हो जाता है । अशोक नन्दा के तीन बेटे बलवंत, विनय और रॉकी हैं । नन्दा के कत्ल की सुई उसके पूरे परिवार पर टिकी रहती है । इंस्पेक्टर नवनीश इस मामले की तहक़ीक़ात शुरू करता है लेकिन अशोक नन्दा की बेटी के प्रयासों के चलते इस कहानी में एंट्री होती है जासूस जयदेव की । इसके बाद की कहानी आप उपन्यास को पढ़कर ही जाने तो ज्यादा मजा आएगा ।

मेरी राय : 
जयदेव जी का यह पहला उपन्यास है और उनका पहला प्रयास अपने आप में सफल रहा है । कहानी में एक के बाद एक नए मोड आते है जो पाठक के अंदर रूचि को और सस्पेंस को बनाए रखते हैं । इंस्पेक्टर नवनीश और जासूस जयदेव के बीच समीकरण पल पल बदलते हैं जो एक कोतूहल जगाते हैं । इस बात का क्या कारण है...  इसके बारे में इस कहानी में कोई खुलासा लेखक ने नहीं किया है लेकिन इस बात के संकेत दिये हैं कि उनका अगला उपन्यास इस कथानक पर से पर्दा उठाएगा । यहाँ मैं एक बात साफ कर दूँ कि यह उपन्यास अपने आप में पूर्ण है । पाठकों को  इस उपन्यास की कहानी जानी-पहचानी लग सकती है लेकिन जयदेव जी कथानक को मजबूती से बांधे रखने में कामयाब रहें हैं । 
उपन्यासों की दुनियाँ के जादूगर श्री वेद प्रकाश शर्मा के लेखन का प्रभाव जयदेव जी की लेखनी और कहानी को बयान करने के अंदाज में नजर आता है और इस बात को वह स्वयं स्वीकार भी करते हैं । यह एक सबल पक्ष भी है लेकिन आगे इस लेखन क्षेत्र में उन्हें अपने पैंतरे भी आजमाने पड़ेंगे ।

जयदेव जी का पहला प्रयास है जिसमें प्रूफ-रीडिंग के मामले में कई कमियाँ रह गई हैं । कई जगह कुछ संवाद/पंक्तियाँ दोबारा छप गई हैं जिससे पाठकों की तन्मयता में बाधा पड़ती है । लेकिन मैं जानता हूँ कि यह (प्रूफ रीडिंग) एक मुश्किल काम होता है और हर लेखक को इससे दो-चार होना ही पड़ता है । 

उम्मीद है कि जयदेव जी वक्त के साथ-साथ अपने भाषाई पक्ष को भी मजबूत बनाते जाएंगे जिससे उनकी स्थिति उपन्यासों की दुनिया में निरंतर मजबूत होती चली जाएगी ।

इन बातों से इतर यह उपन्यास एक रोलर कोस्टर  राइड की तरह से है जिसमें कहानी के अनापेक्षित झटके पाठकों का मनोरंजन करने में पूरी तरह से सक्षम हैं ।      

Jaydev Chavria

  

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