Sunday, December 25, 2022

Chausar : Jitender Nath : Reviews

उपन्यास : चौसर- द गेम ऑफ डेथ
लेखक : जितेन्द्र नाथ
प्रकाशक : बूकेमिस्ट/सूरज पॉकेट बुक्स
अवेलेबल : Sooraj books link chausar
Amazon link चौसर
फ्लिपकार्ट link Chausar
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Reviews by Readers/Authors
चौसर - दि गेम ऑफ डेथ
जितेंद्र भाई का पहला उपन्यास राख पढ़ने के बाद से ही प्रतीक्षा थी उनकी अगली रचना की ,बल्कि उत्कंठा अधिक थी के क्या और कैसा कथानक लेकर आएंगे।
और फिर हाथ मे आया "चौसर " और 
जो पढ़ना शुरू किया तो राजनीति की बिसात पर बिछी रोचक और रोमांचक कहानी के बीच जिसमे जबरदस्त उतार चढ़ाव और तेज रफ्तार घटनाक्रम के बीच  कहानी में जहां राजनीति और औद्योगिक घरानों के बीच संबंधों और फिर उनसे पनपने वाले आतंक के रिश्तो की हकीकत से रूबरू करवाया उसके लिए निसंदेह आपने गजब का होमवर्क किया ।
          उपन्यास पढ़ते हुए कहानी के पात्र हमें हमारे देश काल और परिस्थितियों के अनुरूप ही लगते हैं जिनसे की पाठक तुरंत ही अपना तारतम्य स्थापित भी कर लेता है इससे कहानी में विश्वसनीयता के साथ-साथ पठनीयता का गुण भी  समावेश हो गया है । हालांकि कहानी का  ताना-बाना काफी घुमाव  लिए हुए हैं, लेकिन इन सब का समापन और उपसंहार  भी उतने ही सुघड़ , सुंदर और अच्छे तरीके से किया गया है , की उपन्यास अपनी छाप छोड़ जाता है ।
सच है आज भी हमारे देश कि जो हिफाजत सरहद पर हमारे सैनिक कर रहे हैं उनकी हमारे ही कुछ राजनेताओं को रत्ती भर भी फिक्र नहीं है । वह तो अपनी ओछी  राजनीति में ही उलझे रहते हैं , परन्तु जैसे के  आपने लिखा " देश की रक्षा के लिए शहीद होना ही हर सैनिक का परम लक्ष्य होता है " बिल्कुल सटीक पंक्तियां है  जो कि दिल को भीतर तक छू जाती है और मन में एक ही आवाज गूंजती है --जय हिंद -जय भारत ।
वर्तमान में आ रहे विभिन्न उपन्यासों के बीच बिछी कहानियों की बिसात  पर आपका यह उपन्यास शत प्रतिशत विजयी घोषित होता है। बहुत-बहुत बधाई , और  आगामी रचना के लिए भी शुभकामनाएं , जो की उम्मीद है जल्दी हमारे पास आएगी।
21.12 2022
आपका प्रशंसक
विशाल भारद्वाज
पोस्ट मास्टर
प्रधान डाकघर
श्री गंगानगर -335001
राजस्थान
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
संजीव शर्मा जी, सीनियर एडवोकेट, पुणे की कलम से....                                                  चौसर by जितेंद्रनाथ
बहुत दिनों बाद ऐसी किताब पढ़ी, जिसने पहले पेज की पहली लाइन से ही कहानी में इंटरेस्ट जगा दिया जो अंत तक जारी रहा. कहानी की सबसे बड़ी खूबी कहानी के पात्रों का शानदार चरित्र चित्रण है, हर पात्र को बहुत ही खूबी से लिखा गया है जिसके कारण वो याद रहते हैं चाहे वो अभिजीत देवल, राजीव, सुधाकर, नैना, नागेश, यासिर खान, आलोक देसाई या फिर योगराज, बसंत पवार, दिलावर, अब्बासी हो या राहुल तात्या, सभी कैरेक्टर का चरित्र चित्रण बहुत बढ़िया तरीके से हुआ है, जिसके लिए जितेंद्रनाथ जी बधाई के पात्र हैं.
     कथानक जो आतंकवाद पर आधारित है जो बेहद कसा हुआ है और कहीं भी बोर नहीं करता है, एक्शन भी जबरदस्त है जो कहानी के अनुरूप है सस्पेंस भी अच्छा रहा, एक बेहद विस्तृत कथानक को इतनी आसानी से, अच्छी भाषा, अच्छे शब्दों में लिख कर जितेंद्रनाथ जी ने साबित किया कि उनमें एक सफल लेखक बनने के सभी गुण मौजूद हैं जो हम पाठकों का लंबे समय तक मनोरंजन करेंगे. 
    चौसर निसंदेह एक शानदार, जबरदस्त किताब है जो लंबे समय तक याद रहेगी.
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
हीरा वर्मा जी की कलम से...
उपन्यास : चौसर - द गेम ऑफ डेथ
लेखक : जितेंद्र नाथ सर जी
प्रकाशन : सूरज पॉकेट बुक्स
पृष्ठ संख्या : 279
मूल्य : 360₹

बुकेमिस्ट के द्वारा शानदार कवर डिजाइन और किताब का नाम किसी भी पाठक को अपनी ओर आकर्षित करने से रोक न पाएगी।

लेखक सर की ये तीसरी किताब पढ़ रहा हूँ मैं "चौसर - द गेम ऑफ डेथ"
इसके पहले पढ़ी थी "राख" जो उनके द्वारा लेखन पर पकड़ दर्शायी थी जो कामयाब भी रही

उसी से आकर्षित हो कर ये पढ़ने बैठा

One word : लाजवाब

 *ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम...*
द हार्ट टचिंग लाइन
दीदार सिंह के लिए तो वाह वाह  ही है
आंखे नम कर गए साहब

क्यो ? ये पढ़ के जानिएगा

कहानी शुरू होती है "पर्ल रेसिडेंसी" के होटल से जहाँ "विस्टा टेक्नोलॉजी" के 15 लोग 7 दिन की कॉन्फ्रेंस के लिए आये थे जिन्हें "सिग्मा ट्रेवल्स" की बस अपडाउन करती थी होटल से ऑफिस।

सारे गायब

क्यो ?

का जवाब तो पढ़ के ही मिलेगा

संवाद ने जीवंत बनाये रखा है दृश्य को जेहन में क्योकि चौसर में हार जीत लगी होती है , वही यहां पुलिस की मुठभेड़ ने ताज होटल याद दिला दिया साहब

बोले इसे ले कर और पढ़ कर आप कतई न पछतायेंगे फुलटू पैसा वसूल उपन्यास है।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
[12/4, 5:23 PM] Jitender Nath: ('चौसर' एक शानदार उपन्यास ) 
जब मैं किसी उपन्यास को शानदार कहता हूं तो मेरे शब्दों में उसका अर्थ होता है कि उपन्यास की कहानी ने  एक समां बांध कर रख दिया, अंत वास्तव में बहुत अच्छा है, संवाद अच्छे हैं...
एक बानगी पढ़िए..
 (राजनीतिक एक चौसर का खेल है .........। जो खेल हम खेल रहे हैं वह हमारी जिंदगी की एक नई बाजी है । इस खेल में पासे चाहे कैसे भी पड़ें लेकिन हम लोगों को उम्मीद हमेशा जीत की होती है)
पुलिस की मुठभेड़ कई जगहों पर काफी जीवंत जान पड़ती है, मुठभेड़ के सारे सीन काफी मेहनत से लिखे गए हैं.... मजा आता है पढ़कर, 🥳🥳
जितेंद्र नाथ जी की यह रचना 'पैसा वसूल' है,
Deepankar Shashtri ji
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
मित्र एवं लेखक जितेन्द्र नाथ जी की “चौसर” पढ़ी गई । 📖
बहुत ख़ूब! इतने बड़े स्तर के कथानक को जिस सलीके के साथ (कम पृष्ठों में भी) पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया है,काबिले तारीफ़ है । 🙏
पुनश्च- अंतिम पृष्ठों तक बाँधे रखने और आँखें नम कर देने वाले लेखन के लिए लेखक महोदय को बधाई । 🌹
आबिद बेग जी 👆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
नोवल - चौसर
लेखक - जितेंद्र नाथ
प्रकाशक - सूरज पॉकेट बुक्स
समीक्षक - दिलशाद सिटी ऑफ इविल वाले


अभी अभी जितेंद्र नाथ जी की चौसर पढ़कर पूरी की। इससे पहले मैने उनकी राख पढ़ी जिसने शानदार छाप छोड़ी थी। राख में पुलिस कार्यप्रणाली का सजीव रूप प्रतीत हुआ। चलिए बात करते हैं चौसर की, जिसकी कहानी शुरू होती है होटल पर्ल रेसीडेंसी से, रिसेप्शन पर रात के साढ़े नो बजे फोन बजता है। उधर से एक व्यक्ति अपने बेटे के बारे में पूछता है की क्या मेरा बेटा होटल पहुंच गया। सुबह को ज्ञात होता है कि विष्टा टेक्नोलोजी के पंद्रह एंप्लॉज जो पर्ल रेसीडेंसी में ठहरे थे अभी तक नही आए। ड्राइवर सहित सभी एंप्लॉयज के नंबर बंद जा रहे थे। सूचना पुलिस को दी जाती है। सिग्मा ट्रेवलर्स के दफ्तर से बस की आखिरी लोकेशन का पता चलता है। बस को घेर लिया जाता है लेकिन उसमे अजनबी ड्राइवर निकलता है। अब सभी का दिमाग चकरा जाता है की सभी यात्री कहां गए और ड्राइवर क्यों बदला।
अगली सुबह एक नदी में एक एंप्लॉय की लाश मिलती है।  एक दृश्य में 26 ग्यारह की याद ताजा हो जाती है। जब आतंकवादी एक होटल में हतियारो को गरजाते हुए हुए घुसते हैं। बेहद ही लाइव दृश्य महसूस होता है। आपको नोवल में अनेकों सवाल मिलेंगे जैसे...
बस अपने गंतव्य तक क्यों नही पहुंची?
जो ड्राइवर पकड़ा गया था वह खाली बस लेकर क्यों जा रहा था?
क्या एम्प्लेयर्स मिल सके?
किसका हाथ था एंप्लायस के गायब कराने के पीछे?
कहानी एक्शन पैड है। देशभक्ति से लबरेज है। देश की सुरक्षा दांव पर लगी है। देश के वीर, जांबाज, जान को जोखिम में रखने वाले हीरो इस मिशन में कूद पड़ते हैं। जैसा कि बताया है कहानी एक्शन पैड, सस्पेंस और देशभक्ति समेटे हुए हैं तो दिमागी मनोरंजन की आशा न करें। कहीं कहीं डायलॉग शानदार और जबरदस्त हैं। देश की सुरक्षा के लिए हमारे वीर क्या कर गुजरते हैं इस नोवल में दिखाया गया है। किरदारों में सुधाकर नागेश धनंजय राय, राजीव जयराम, आलोक देसाई, नैना दलवी, शाहिद रिज्वी, नागेश कदम, मिलिंद राणे जैसे हीरो थे। लेखक ने शानदार मराठी भाषा का भी प्रयोग किया है। 
एक शानदार डायलॉग जब श्रीकांत सुधाकर से पूछता है, "कैसे हो अब तुम? ज्यादा चोटें तो नही आईं?
तब सुधाकर बुलंद आवाज में कहता है, "ये चोटें तो हमारे शरीर का गहना है सर। जितनी बढ़ेंगी उतना ही मजा आयेगा।"
विदा लेता हूं आपसे फिर मुलाकात होगी, जितंद्रनाथ जी को ढेरों शुभकामनाएं।
 दिलशाद अली
★★★★★★★ ★★★★★★★★★★★★★★★

श्री मनेंद्र त्रिपाठी की कलम से चौसर के बारे में राय। हार्दिक आभार आपका मनेंद्र जी 💐💐💐
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"राख" के बाद लेखक का दूसरा शानदार कारनामा । वैसे भी जहां राख होती है वहां संभावी अगला काम होता है "गर्दा उड़ना' । लेखनी के इस फेरहिस्त में शामिल है "चौसर" जो इस धारणा के "गर्दे" उड़ा देती है कि कोई उपन्यास क्या एक्शन थ्रिलर हो सकती है ? जी हां हो सकती है ।

एक्शन, जिसको सिर्फ बड़े परदे पर ही महसूस किया जा सकता है, इस मिथक को बड़े ही आसानी से लेखक साहब ने जब्त कर के निर्माण किया है "चौसर"का । इस उपन्यास को पढ़ने के बाद आप अपनी भुजाएं फड़कती हुई महसूस करें तो कोई ताज्जुब नहीं । थ्रिलर और एक्शन का अनुपम मिश्रण महसूस करने के लिए इस उपन्यास को पढ़ें ।

कहानी बिल्कुल फ्रेश है । एक कंपनी की एक गाड़ी जिसमे कंपनी के बहुत से कर्मचारी अपनी छुट्टियां बिताने,तफरीह के वास्ते सवार होते है । अगले दिन गाड़ी के साथ साथ सभी कर्मचारी 'अंतर्ध्यान ' हो जाते हैं । बस यही से शुरू होता है एक्शन पैक्ड रोमांच । उपन्यास के हर पेज पर आपके रोमांच की सीमा बढ़ती चली जायेगी । बस आपको एक काम करना है कि इस उपन्यास को ध्यान से पढ़ना है क्योंकि इस उपन्यास में पात्र चरित्र थोड़े ज्यादा है इसलिए आपको कहानी के साथ साथ चलना है । देशभक्ति, राजनीति, षड्यंत्र,मजबूरी,कूटीनिति, शठे शाठ्यम समाचरेत् ,आदि अनेक विधाओं से गुजरते हुए यह उपन्यास आपको नम आंखों के साथ बहुत कुछ सोचने समझने के लिए छोड़कर तृप्त कर देगा ।


अगर आप प्रचलित श्रेणी के थ्रिलर उपन्यासों से बेजार हो चुके हैं तो आपको मौका है अपने सारे हिसाब बराबर करने का , अभी पढ़ना शुरू कीजिए "चौसर" । उपन्यास समाप्त होते होते अपनी भुजाएं खुद ब खुद फडकती महसूस होंगी। उपन्यासों में 'ट्विस्ट ' खोजने वालों को इस उपन्यास के बाद चाह होगी सिर्फ और सिर्फ रोमांच की ।

लेखक महोदय को इस हाहाकारी शाहकार के लिए अनगिनत धन्यवाद । आपकी आगामी रचना के लिए अभी से इंतजार करता हुआ लेखक का  एक उन्मादी पाठक ।

Saturday, October 8, 2022

Balraj Sahni : Meri filmy atamkatha

पुस्तक  : मेरी फिल्मी आत्मकथा 
लेखक : बलराज साहनी 
सम्पादन : संतोष साहनी 
प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स ( इंप्रिंट ऑफ पैंगविन बुक्स)
मूल्य : 199/-
पृष्ठ : 199

हिन्दी सिनेमा में बलराज साहनी को कौन नहीं जानता । बलराज साहनी किसी परिचय के मोहताज भी नहीं है । कौन भूल सकता है फिल्म सीमा का वह गीत जिसमें अपनी आँखों से लाचार किरदार गाता है 'तू प्यार का सागर है' और नूतन को राह दिखाता है । हिन्दी फिल्म के इतिहास में स्वरणक्षरों में दर्ज की गई 'दो बीघा जमीन' का वह मजदूर किसान जिसे बलराज साहनी ने अपने अभिनय से जीवंत कर दिया था, आज भी फिल्मी दीवानों के दिलो दिमाग पर छा जाता है । बलराज साहनी की अन्य महत्वपूर्ण फिल्में है : भाभी, अनपढ़, वक्त, अनुपमा, काबुलीवाला, हँसते जख्म, गरम हवा, पराया धन इत्यादि ।

प्रस्तुत किताब बलराज साहनी का फिल्मी सफरनामा ब्यान करती है जिसका वर्णन बलराज साहनी ने किया है । शायद यह पुस्तक पहले पंजाबी में छपी थी जिसे हिन्दी में बाद में प्रकाशित किया गया है । बलराज साहनी की यह किताब पढ़ना एक तरह से अतीत के सिनेमा की यात्रा करने के समान है । यह पुस्तक अपने समय की एक चर्चित पुस्तक है जिसे सिनेप्रेमियों और साहित्य प्रेमियों ने बड़ा सराहा था । पुस्तक के रूप में छपने से पहले यह किसी अखबार में शायद धारावाहिक के रूप में छपी थी ।

बलराज साहनी के कैरियर की शुरुआत शांतिनिकेतन में अध्यापन के तौर पर शुरू हुई लेकिन मन उनका अभिनय के क्षेत्र में पलायन करने को हमेशा बेताब रहता था । उनकी पहली पत्नी दमयंती, जिसका जिक्र उन्होंने दम्मो के रूप में किया है, उनके साथ शांतिनिकेतन और रेडियो में समान रूप से सक्रिय रहीं । फिल्मों में दमयंती का कैरियर बलराज से पहले शुरू हुआ जिसकी कुंठा का बलराज जी ने बड़ी बेबाकी से वर्णन किया है । इतना बड़ा अभिनेता भी पौरुष दंभ और कुंठा का शिकार रहा जिसे बलराज जी ने ईमानदारी से स्वीकार किया है । 

'मेरा कर्तव्य था कि उस समय अपनी पत्नी की ढाल बनता, उसके कलात्मक जीवन की कद्र करता, रक्षा करता, उसे फिज़ूल के झमेलों से बचाता और पारिवारिक जीवन की जिम्मेदारियाँ अपने ऊपर लेता । पर मैं अपनी संकीर्णता के कारण मन ही मन दम्मो की प्रसिद्धि से ईर्ष्या करने लगा था । वह स्टूडिओसे थकी हारी हुई आती तो मैं उससे ऐसा सलूक करता जैसे वह कोई गलती करके आई हो । मैं चाहता कि वह आते ही घर के काम-काज में लग जाये जोकि मेरी नजर में उसका असली काम था । अपने बड़प्पन का दिखावा करने के लिए मैं इप्टा और कम्यूनिस्ट पार्टी के अनावश्यक काम भी करने लग जाता था..... बेचारी बिना किसी शिकायत के वह सारा भार उठाती गई जिसे उठाने का उसमें सामर्थ्य नहीं था । इन बातों को याद करके मेरे दिल में टीस उठती है । दम्मो एक अमूल्य हीरा थी जो उसके माता-पिता ने एक ऐसे व्यक्ति को सौंप दिया था जिसके दिल में न उसकी कोई कद्र थी, न ही कोई कृतज्ञता का भाव था । (पेज 127) 

बलराज साहनी ने सपत्नीक बीबीसी लंदन में काम किया और उस वक्त के जीवन और बेफिक्री का, जिसे हम भौतिक सुख-सुविधा का आभा मण्डल कह सकते हैं, बड़े विस्तार से वर्णन किया है । उस वक्त सिनेमा का विकास हो रहा था और विश्व में साहित्य को सिनेमा के पर्दे पर उतारा जा रहा था । उनके मन पर उस वक्त की एक रूसी फिल्म 'सर्कस' का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा । उस वक्त की रूसी फिल्मों के प्रभाव के कारण वे कम्यूनिस्ट विचारधारा की तरफ मुड गए ।

'इस तरह सोवियत यूनियन, मार्क्सवाद और लेनिनवाद से मेरी पहचान फिल्मों के द्वारा हुई । मैं उस देश को जानने के लिए उत्सुक हो गया जो इतनी अच्छी फिल्में बनाता था ... मार्क्सवाद के बारे में पढ़ते हुए मुझे रजनी पामदत्त और कृष्ण मेनन का पता चला । मुझे समझ आने लगा कि महायुद्ध क्यों होता है ? (पेज 38)

आज हम बलराज साहनी को एक महान अभिनेता के तौर पर जानते हैं । अभिनय के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने से पहले उन्हें अपनी जड़ता की बेड़ियाँ तोड़ने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा । इसके लिए चरित्र अभिनेता डेविड के साथ बलराज साहनी का संस्मरण एक अभिनेता के रूप में उनकी बेचैनी को दर्शाता है । 'हम लोग' की सफलता से पहले इस जड़ता ने उनका पीछा नहीं छोड़ा । महान फ़िल्मकार के आसिफ की फिल्म 'हलचल' के वक्त का अनुभव वे कुछ यूं दर्ज करते हैं : 

'कैमरे के सामने जाना मुझे सूली पर चढ़ने के बराबर लगता था । मैं अपने आपको संभालने की बहुत कोशिश करता । कई बार रिहर्सल भी अच्छी भली कर जाता ।  सभी मेरी हिम्मत बढ़ाते । पर शॉट के एन बीच में मुझे पता नहीं क्या हो जाता कि मुझे अपने अंग अंग जकड़ा हुआ लगता...' पेज 150  

'मेरी फिल्मी आत्मकथा' अभिनय के शिखर पर पहुंचे हुए एक महान अभिनेता के फिल्मी अनुभव है जिसे बड़ी ईमानदारी के साथ लिखा गया है । लेखन शैली के हिसाब से यह संस्मरणात्मक पुस्तक बेजौड़ है और साहित्य में एक अलग स्थान रखती है । फिल्मों से प्रेम करने वाला व्यक्ति इसे अवश्य ही पढ़ना चाहेगा लेकिन प्रकाशन की हल्की गुणवत्ता पाठकों को निराश करती है ।

पुस्तक की क्वालिटी के कड़वे अनुभव : 

बलराज साहनी की यह किताब बड़े चाव से मंगवाई थी। इस किताब के साथ बड़े प्रकाशन 'पेंगुइन' का नाम जुड़ा है लेकिन किताब में इतनी गलतियां है कि सारा मजा किरकिरा हो गया। प्रूफ रीडिंग बहुत ही निचले स्तर की है... या यूं कहिए कि स्तर है ही नहीं
आप भी गौर कीजिए...
इतनी शानदार आत्मकथा का दोयम दर्जे का प्रस्तुतिकरण दिल को दुखा गया। 
आलम आरा मूवी को सभी भारतीय जानते हैं और बलराज साहनी उसको गलत नहीं लिख सकते। जिन पृष्ठों को मैंने शेयर किया है, उसमें आप पालम पारा... पालम आरा छपा हुआ देख सकते हैं। पी सी बरुआ अपने समय के दिग्गज निर्देशक थे। पर पेज नंबर 31पर बरुणा, बरुमा, बरूपा लिखा हुआ है मजाल है कहीं बरुआ छापने की जहमत उठाई हो। संगीत निर्देशक आर सी बोराल को पार सी बोराल लिखा गया है। बलराज साहनी चाहे किसी भी भाषा में लिखें लेकिन उन जैसा जहीन कलाकार ऐसी गलती नहीं करेगा। यह सरासर प्रकाशन में हुई लापरवाही है। हर पेज पर यही हाल है।
पुस्तक का प्रस्तुतुकरण भी बेहद बचकाना है । आवरण पृष्ठ के लिए ब्ल्राज साहनी के चित्र निराश करता है । यकीनन बलराज साहनी के इससे श्रेष्ठ छाया चित्र उपलब्ध होंगे । पैंगविन और हिन्द पॉकेट बुक्स के बड़े नाम जुड़े होने के बावजूद पुस्तक का प्रस्तुतुकरण निराश करता है ।
         © जितेन्द्र नाथ 

मेरी फिल्मी आत्मकथा : बलराज साहनी 

त्रुटियों की भरमार 
घटिया स्तर की प्रूफ रीडिंग
गलतियाँ ही गलतियाँ 

Wednesday, September 28, 2022

Janpriya Lekhak Om Parkash Sharma : Andhere ke Deep : A Novel

 

जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा : अंधेरे के दीप : एक प्रासंगिक व्यंग्य

उपन्यास : अंधेरे के दीप 

लेखक : जनप्रिय ओम प्रकाश शर्मा

प्रकाशक : नीलम जासूस कार्यालय, रोहिणी, दिल्ली - 110085

ISBN : 978-93-91411-89-3

पृष्ठ संख्या : 174

मूल्य : 200/-

आवरण सज्जा : सुबोध भारतीय ग्राफिक्स, दिल्ली  

AMAZON LINK :अँधेरे के दीप

अंधेरे के दीप

जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा मुख्यतः अपने जासूसी उपन्यासों और पात्रों के लिए जाने जाते हैं लेकिन उनके द्वारा कई ऐतिहासिक और सामाजिक उपन्यास भी लिखे गए हैं जिनकी विस्तृत चर्चा शायद किसी माध्यम या प्लेटफॉर्म पर नहीं हुई । पाठक वर्ग पर उनके जासूसी किरदारों का तिलिस्म इस कदर हावी हुआ कि उनके द्वारा रचा गया 'खालिस साहित्य' नैपथ्य में चला गया ।

नीलम जासूस कार्यालय द्वारा जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा जी के पुनःप्रकाशित उपन्यास 'अंधेरे के दीप' को 'सत्य-ओम श्रंखला' के अंतर्गत मुद्रित किया गया है । 'सत्य-ओम श्रंखला' को नीलम जासूस कार्यालय के संस्थापक स्वर्गीय सत्यपाल जी  और श्री ओम प्रकाश शर्मा जी की याद में शुरू किया गया है ।

लाला छदम्मी लाल 'अंधेरे के दीप' के नायक हैं या यू कहिए कि यह उपन्यास उनको केंद्रीय पात्र बनाकर लिखा गया है । अपने केंद्रीय पात्र के बारे में ओम प्रकाश शर्मा जी कुछ यूं लिखते हैं : 'उस कारीगर ने विषय वस्तु का तो ध्यान रखा लेकिन रूप के बारे में वह वर्तमान हिन्दी कवियों की भांति प्र्योगवादी ही रहा .... रंग के बारे में भी गड़बड़ रही । उस दिन जब कि लाला के ढांचे पर रोगन किया जाने वाला था, हिंदुस्तान के इन्सानों को रंगने वाला गेंहुआ पेन्ट आउट ऑफ स्टॉक हो चुका था ...कारीगर ने काला और थोड़ा सा बचा लाल मिलाकर 'डार्क ब्राउन' लाला पर फेर दिया । नौसखिये  प्र्योगवादी कलाकार के कारण हमारे गुलफाम हृदय सेठ जी के होंठ ऐसे हैं मानो किसी सुघड़ कुंवारी कन्या द्वारा छोटे - छोटे उपले थापे गए हों ।'

जैसा ऊपर विवरण दिया गया है उसके हिसाब से आप समझ सकते हैं कि ओम प्रकाश शर्मा जी ने प्रचलित मान्यता के विपरीत एक ऐसा पात्र गढ़ा है जो शारीरिक रूप से सुन्दर नायक की श्रेणी में किसी भी कसौटी के हिसाब से पूरा नहीं उतरता है । लेकिन अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान । जब धन्ना सेठ फकीरचंद के इस लाल को भरपूर दौलत मिली हो तो शारीरिक सुंदरता के सारे नुक्स ढक जाते हैं । एक कहावत हमने सुनी है कि लंगूर के पल्ले हूर । रंभा के साथ लाला छदम्मी लाल का परिणय सूत्र में बंधना भी एक प्रकार का सौदा ही था जिसे लाला फकीरचंद ने अंजाम दिया । अब लाला छदम्मी के पास रंभा के रूप में खजाना होते हुए भी 'अंधेरे के दीप' के नायक छदम्मी के हाथ फूटी कौड़ी नहीं ! 

इसी कहानी में लाला छदम्मी के किस्से के साथ नवाब नब्बन और मैना का किस्सा है । जिसमें शायराना तबीयत का नवाब मैना के लिए दलाल का काम करता है । घूरे गोसाईं और गूदड़मल के राजनीतिक दावपेंच हैं । सुंदरलाल भी मौजूद है जो नाम के अनुरूप है पर है कड़का । प्रेम नाम का एक आदर्शवादी पात्र भी है जो नब्बन को वह इज्जत देता है जिसका वह स्वयं को पात्र नहीं समझता है । 

इस कहानी में ओम प्रकाश शर्मा जी ने राजनीति का बड़ा चुटीला और व्यंग्यात्मक विश्लेषण किया है ।एक पाठक के रूप में यह उपन्यास पढ़कर मैं अपने आप को चकित और मंत्रमुग्ध पाता हूँ । इसका एक कारण है इसके प्रासंगिकता । गूदड़मल  और गोसाईं के राजनीतिक दावपेंच आपको कहीं से भी पुराने नहीं लगेंगे । मुझे ऐसा लगा जैसे वे आज हो रही घटनाओं का सटीक विवरण लिख रहें हैं । स्वामी घसीटानन्द का प्रकरण इस बात का सुंदर उदाहरण है । जैसी उखाडपछाड़ जनसंघ और काँग्रेस में पूँजीपतियों को अपने वश में करने के लिए लगातार चलती रहती है उसका भी बड़ा चुटीला वर्णन किया गया है ।

समाज की बहुत बड़ी विद्रूपता 'अंधेरे के दीप' में दिखाई गई है। जो लोग समाज के अग्रणी लोग समझे जाते हैं, वे और उनका तबका किस हद तक नैतिक पतन का शिकार हो चुका है, यह हम सब जानते हैं । आए दिन की अखबार की सुर्खियाँ यह बताने के लिए काफी हैं । रंभा और लाला छ्द्दम्मी उनका प्रतिनिधित्व करते है । जो लोग समाज में दबे हुए है, नैतिकता और समाजिकता का सरोकार भी उन्हीं लोगों को है । मैना और नवाब नब्बन अपने तमाम कार्यों के बाद भी  रंभा और सुंदरलाल के मुकाबले उजले ही प्रतीत होते हैं ।

ओमप्रकाश शर्मा जी की भाषा एक अलग ही आयाम लिए हुए है । कसी हुई, कभी चुभती हुई और कभी गुदगुदाती हुई । ओम प्रकाश शर्मा जी के साहित्य के इंद्रधनुषी रंगों में से एक अलग ही रंग मुझे 'अंधेरे के दीप' में दिखा जो 'रुक जाओ निशा' की गंभीरता से अलग और 'प्रलय की साँझ' की ऐतिहासिकता से अलग है । यह रंग है व्यंग्य के बाणों का ।

मेरी नजर में यह उपन्यास कल भी सफल रहा होगा और आज भी प्रासंगिक है । जो समय की छाप शर्मा जी के कई जासूसी उपन्यासों पर नजर आती है उससे यह उपन्यास अछूता रहा है । अगर कुछ समय के लिए अपने वर्तमान को साथ लेकर अतीत में जाना चाहते हैं तो 'अंधेरे के दीप' अच्छी पसंद हो सकता है जिसमें जिस दिये की लौ अधिक है वह उतना ही काले धुएँ से ग्रसित है और जिस दिये के लौ टिमटिमा रही है वह उतना ही अधिक प्रकाशमान ।

और अंत में दो पंक्तियाँ उपन्यास के मुख्य पृष्ठ के बारे में... अवतार सिंह सन्धू पंजाब के इंकलाबी कवि हुए हैं जिन्हें 'पाश' के नाम से मकबूलियत हासिल हैं और आतंकवाद के दौर में उनकी आवाज को बन्दूक की गोली से शान्त कर दिया गया था। उनकी शख्शियत यानी चित्र को मुख्यपृष्ठ पर इस्तेमाल करना मुझे अखरा। मेरे ख्याल से यह उस क्रांतिकारी कवि के सम्मान में उचित नहीं है।

जितेन्द्र नाथ 

जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा 

 

Thursday, August 25, 2022

5 books in my library

मेरा दुश्मन - कृष्ण बलदेव वैद 
रात की सैर - कृष्ण बलदेव वैद 
सीढ़ियां मां और उसका देवता - भगवानदास मोरवाल 
तीरथराम पत्रकार - बच्चन सिंह 
अदब से मुठभेड़ - ओमा शर्मा 
एक दिन मथुरा में - नरेंद्र कोहली 
श्री सुरेंद्र राणा जी जो हमारे पास ही के जिला सोनीपत से संबंध रखते हैं। सुरेंद्र राणा जी जो जहां एक बेहतरीन पाठक हैं वहीं एक शानदार पुस्तकप्रेमी भी हैं।  उनके माध्यम से कई बार ऐसी पुस्तकें प्राप्त होती हैं जो अन्यत्र कहीं उपलब्ध नहीं होती । आज इसी श्रृंखला में मेरी लाइब्रेरी में कुछ अनमोल नगीने शामिल हुए ।
1)कृष्ण बलदेव वैद के दो कहानी संग्रह 'मेरा दुश्मन' और 'रात की सैर' दो खंडों में है जिसमें कृष्ण बलदेव वैद जी की 1951 से 1998 तक की लिखी हुई कहानियां संकलित हैं ।
कृष्ण बलदेव वैद जी का कहानी संग्रह 'मेरा दुश्मन' नेशनल पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित हुआ है जिसमें 47 कहानियां संकलित हैं ।
इस कहानी संकलन में निम्नलिखित कहानियां हैं - बीच का दरवाजा, उड़ान, पवन कुमारी का पहला सांप, जामुन की गुठली, एक बदबूदार गली, एक कुतुबमीनार छोटा सा, लक्ष्मण सिंह, अपना मकान, शंकर, खामोशी, टुकड़े, अगर मैं आज, माई की महिमा, ऋण, बुढ़िया की गठरी, दो आवाज और एक खामोशी, वह मै हम, सब कुछ नहीं, भूत, मुरारीफ फूलवाला और मेम साहब, कबर बिज्जू, रीडिंग रूम, इनकार, अजनबी, अमित, अंधेरे में उपदेश, मरी हुई मछली, अवसर, सुमित्रा के भूत, कोलाज एक और दो, मेरा दुश्मन, मेरा क्या होगा, लापता, शैडोज, त्रिकोण, दूसरे का विस्तर, वह कौन थी, समाधि, विमल काफी हाउस और बुनियादी सवाल, एक था विमल, नीला अंधरा, रात का चीरफाड, आलाप, तीन भूत और इत्यादि कहानियां सम्मिलित हैं ।
दूसरे कहानी संग्रह 'रात की सैर' में कुल 40 कहानियां संकलित हैं । जिसमें बाद मरने के मेरे, दूसरा न कोई, अनात्मालाप, वह और मैं, उसके बयान, चोर दरवाजा, हमसफर, हवा, बू,  गढा, सफलता, आगंतुक, पेड़, चेहरा, जाल, पिछले जन्म की बात है, रात की सैर, भोर का भय, लीला, प्रवास गंगा, उस चीज की तलाश, दूसरे किनारे से, यह काले पर्दे कैसे हैं, आगे देखो फतेहपुरी, भूख कुमारी के साथ एक शाम, उसकी आगोश में, चोरों का चोर, अंधेरे की आत्मा, पुतला, शहर के साथी, चौथी खिड़की, साहिरा, गुंजल का खेल, दो, दूरियां, इबारत, तीन दुस्वप्न, पिता की परछाइयां, रात और एक सफरनामा शामिल हैं ।
2) 'कीरतराम पत्रकार' बच्चन सिंह जी द्वारा लिखित एक उपन्यास है जिसे एक ग्रामीण पत्रकार के जीवन को आधार बनाकर लिखा गया है ।
3) 'अदब से मुठभेड़' ओमा शर्मा जी द्वारा 5 साहित्यकारों के साक्षात्कार का संकलन है जिसमें राजेंद्र यादव, प्रियवंद, मन्नू भंडारी, मकबूल फिदा हुसैन और शिव मूर्ति के साक्षात्कार शामिल हैं ।
4)अगलली पुस्तक 'सीढियाँ, मां और उसका देवता'  भगवान दास मोरवाल जी की लिखी कहानियों का संग्रह है जिसमें 15 कहानियां संकलित हैं ।
5) एक दिन मथुरा में नरेंद्र कोहली जी की कहानियों का संकलन है जिसमें 11 कहानियां संकलित हैं ।
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Tuesday, June 28, 2022

सुबोध भारतीय : हैशटैग : बदलते समाज में उम्मीदों को तलाश करती कहानियाँ

 पुस्तक : हैशटैग – अर्बन स्टोरीज़

लेखक : सुबोध भारतीय

प्रकाशन : सत्यबोध प्रकाशन, सैक्टर 14 विस्तार, रोहिणी

पृष्ठ : 168

मूल्य : 175/-

उपलब्ध : अमेज़न और सत्यबोध प्रकाशन पर उपलब्ध

इस कहानी-संग्रह के लेखक सुबोध भारतीय जी प्रकाशन क्षेत्र में अपने पिता श्री लाला सत्यपाल वार्ष्णेय की विरासत को संभाले हुए दूसरी पीढ़ी के ध्वजवाहक हैं । सुबोध जी नीलम जासूस कार्यालय और उसकी सहयोगी संस्था सत्यबोध प्रकाशन को एक बार फिर से वह मुकाम दिलाने की पुरजोर प्रयास कर रहें है जो नीलम जासूस कार्यालय को लोकप्रिय साहित्य के स्वर्णिम काल में हासिल था । वे अपनी कोशिशों में काफी हद तक कामयाब भी रहें हैं । 2020 के कोरोना काल से अबतक उनके प्रकाशन संस्थान से सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जो उनकी अदम्य जिजीविषा का ही परिणाम है ।

इन सब व्यस्तताओं के बावजूद सुबोध जी का एक साहित्यकार रूप भी सामने आया है । उनके द्वारा लिखी हुई कहानियों का संग्रह #हैशटैग-अर्बन स्टोरीज़, हाल ही में, नीलम जासूस कार्यालय की सहयोगी संस्था, सत्यबोध प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है ।

#हैशटैग : टाइटल पेज

 आजकल, जीवन का ऐसा कोई पल नहीं है जिसमें हम सोशल मीडिया से न जुडें हों । सुबह की शुभकामनाओं से लेकर रात्रि के सोने तक हम इस आभासी संसार से दूर नहीं हैं । सोशल मीडिया में #हैशटैग किसी क्रान्ति से कम नहीं है जो कई प्रकार से सामाजिक सरोकारों से दूर बैठे हुए अंजान लोगों को एक मंच पर लाने का काम करता है  । सुबोध भारतीय जी की किताब का शीर्षक अपने आप में अलग है जो पाठक को पहले ही  आगाह कर देता है कि किस तरह के समाजिक परिवेश की कहानियाँ उसे पढ़ने को मिलने वाली हैं ।

किताब का मुखपृष्ठ साधारण होते हुए भी अपने आप में एक असाधारण कलात्मकता को दर्शाता है । आवरण पर दिखाई गई युवती इस कहानी संग्रह में शामिल #हैशटैग नामक कहानी की नायिका हो सकती है या फिर सुबोध भारतीय जी की कहानी के पात्रों में से कोई भी पात्र, जो अपने जीवन के अँधियारे पलों में से कुछ रोशनी ढूँढने की तमाम कोशिश करते हैं । उस युवती के चेहरे पर परिलक्षित होती रेखाएँ  प्रतीक हैं उन दुविधाओं, परेशानियों और दुख का, जिनसे समाज का हर नागरिक अपने जीवन में कभी न कभी सामना करता है ।

#हैशटैग : अर्बन स्टोरीज़ : बदलते समाज में उम्मीदों को तलाश करती कहानियाँ

आप इस पुस्तक को 8 कहानियों का एक गुलदस्ता कह सकते है जिसमें हर कहानी का रंग अलग है, परिवेश बेशक महनगरीय है लेकिन ये कहानियाँ हर किसी सामाजिक परिवेश का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता रखती है । इन आठ कहानियों में क्लाइंट, खुशी के हमसफर, शीर्षक कहानी #हैशटैग, बिन बुलाये मेहमान, अहसान का कर्ज, अम्मा, हम न जाएंगे होटल कभी, डाजी : खुशियों का नन्हा फरिश्ता सम्मिलित हैं । हर कहानी शुरुआत से ही एक कौतूहल जगाने में कामयाब होती है जिससे पाठक तुरंत उस कहानी का अंत जानना चाहता है । यही बात इस कहानी संग्रह को कामयाबी प्रदान करती है ।

1. क्लाइंट : यह कहानी महानगरीय जीवन में अकेले रह रहे देव प्रसाद की कहानी है जिसका एक अपना अतीत है । उस अतीत के साये में एकाकी और श्याम-श्वेत जीवन जी रहे देव प्रसाद को एक टेलेफोनिक काल वापिस उम्मीद भरे भविष्य की तरफ खींच लाती है जहां उसके तसव्वुर में फिर रंग बिखरने लगते हैं । सुबोध भारतीय जी ने देव प्रसाद के चरित्र के माध्यम से पुरुष मनोवृति का सटीक चित्रण किया है । इस तरह की मनोदशा से लगभग सभी पुरुष अपने जीवन की किसी न किसी अवस्था गुजरते हैं । किसी नारी का सामीप्य देव प्रसाद की कल्पना के घोड़ों को एक ऐसी उड़ान प्रदान करता है जिसका अंत उसके काल्पनिक भविष्य को चकनाचूर कर देता है । मानवीय मनोविश्लेषण करते हुए सुबोध जी ने इस कहानी को सार्थक परिणति प्रदान की है ।

2.खुशी के हमसफर/ #हैशटैग : लिव-इन रिलेशन महानगरीय जीवन में पनपता एक नया रोग है जिसे समाज में अभी पूर्ण स्वीकार्यता नहीं मिली है । सुबोध भारतीय जी ने अपनी दोनों कहानियों में लिव-इन रिलेशन के दो अलग-अलग पहलुओं को सामने रखा है । खुशी के हमसफर में जहां पर निरुपमा वर्मा और राजेन्द्र तनेजा के बीच में एक दूसरे के प्रति सम्मान और नैतिक समर्पण है जो शारीरिक लिप्साओं से परे है वहीं पर #हैशटैग में नई पीढ़ी की मानसिक और शारीरिक स्वछंदता का चित्रण है जहां पर मानवीय संवेदनाएं जीवन के सबसे निचले पायदान पर है । खुशी के हमसफर बढ़ती उम्र के साथ संतान के अपने माता-पिता से विमुख हो जाने की व्यथा के साथ-साथ जीवन के आखिरी पड़ाव में भी जीवन को सार्थकता प्रदान करने की जद्दोजहद को बखूबी दर्शाती है वहीं #हैशटैग सोशल मीडिया के नकारात्मक और सकारात्मक पहलुओं को इंगित करती है ।

3. बिन बुलाये मेहमान/अहसान का कर्ज़ : इन दोनों ही कहानियों में मेहमानों का चित्रण है । बिन बुलाये मेहमान में आगंतुक किशन और राधा, मोहित के जाने-पहचाने मेहमान हैं, वहीं पर अहसान का कर्ज़ में सुखबीर के घर में मेहमान के तौर पर आने वाले सरदार जी गुरविंदर रहेजा उसके लिए नितांत अजनबी हैकई बार जो लोग हमें किसी बोझ की तरह से लगते हैं वही लोग हमारे जीवन में खुशियाँ भर देते हैं और जिनसे हमें बहुत उम्मीद होती है वो लोग मुश्किल के समय पीठ दिखा जाते हैं । वहीं पर जाने-अनजाने मुश्किल वक्त में किसी को दिया गया सहारे के रूप में रोपा गया बीज वक्त के साथ कई गुना फल देकर जाता है । इन दोनों कहानियां इन दोनों भावनाओं को केंद्र में रख कर आगे बढ़ती हैं ।

4. अम्मा : इस कहानी का ताना-बाना एक अंजान वृद्ध स्त्री और एक परिवार के बीच पनपते स्नेह और  अपने आत्मसमान को बनाए रखने की कहानी है । एक अंजान भिखारिन की तरह जीवन-यापन करती हुई एक वृद्धा अम्मा के रूप में रेणु के परिवार का अभिन्न अंग बन जाती है । विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आप को टूटने और बिखरने से बचाने की सीख दे जाती है अम्मा । यह कहानी लेखक के नजरिए से चलती है और अंत सुखद है ।

5. हम न जाएँगे होटल कभी : यह कहानी एक हल्के-फुल्के अंदाज में लिखी गई है । इसे हम हास्य और व्यंग का मिश्रण कह सकते हैं । कहानी एक रोचक अंदाज में लिखी गई है जो इस बात का परिचायक है कि सुबोध जी व्यंग के क्षेत्र में बखूबी अपनी कलम चला सकते हैं । उम्मीद है कि इस विधा में उनकी और भी रचनाएँ पढ़ने को मिलेंगी ।

6. डाज़ी-खुशियों का नन्हा फरिश्ता : यह इस संग्रह का सबसे अंतिम कहानी है । एक पालतू जानवर किस तरह से परिवार में अपनी जगह बना लेता है, इसका सुबोध भारतीय जी ने डाज़ी के माध्यम से बड़ा खूबसूरत और मार्मिक चित्रण किया है । हम लोगों में से बहुत से लोग इस अनुभव से गुजरे हैं और ऐसा लगता है कि जैसे हमारे ही परिवार की बात चल रही है । इस कहानी या यूं कहे कि रेखाचित्र को पढ़ने के बाद यूं लगने लगता है कि डाज़ी हमारे आसपास ही है ।

प्रस्तुत कहानी-संग्रह की कहानियाँ जीवन में धूमिल होती किसी न उम्मीद को तलाश करती हुई प्रतीत होती हैं । क्लाईंट और डाज़ी को छोडकर सभी कहानियाँ एक सुखांत पर जाकर ख़त्म होती हैं जो लेखक के सकारात्मक सोच का परिचायक है । काश, ऐसा आम जिंदगी में भी हो पाता ।

सुबोध भारतीय जी की भाषा शैली बिलकुल सरल है । मेरी नजर में, किसी लेखक का सरलता से अपनी बात कह देना और पाठक तक अपना दृष्टिकोण पहुंचा देना सबसे कठिन होता है । किसी भी कहानी में उन्होने अपनी विद्वता का प्रदर्शन नहीं किया है जो काबिले तारीफ है वरना तो साहित्य का एक पैमाना यह भी हो चला है जो रचना पढ़ने वाले के सिर पर जितना ऊपर से जाएगी वह उतनी ही श्रेष्ठ होगी । अपने पाठक के धरातल पर जाकर उससे संवाद करना सुबोध जी खूबी है । कुछ जगहों पर दोहराव है जिससे बचा जा सकता है ।

इस श्रेष्ठ साहित्यिक कृति के लिए सुबोध जी को हार्दिक बधाई । सर्वश्रेष्ट इस लिए नहीं कहा कि अभी तो आग़ाज़ हुआ है और उम्मीद है कि हम पाठक उनकी रचनाओ से अब लगातार रूबरू होते रहेंगे ।

 #यह समीक्षा तहक़ीक़ात पत्रिका के दूसरे अंक में प्रकाशित हुई है ।



हैशटैग-अर्बन स्टोरीज


 

 

 

Wednesday, May 4, 2022

भीष्म साहनी:शोभायात्रा

कहानी संग्रह: शोभायात्रा
लेखक: भीष्म साहनी
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ:120
मूल्य: 125/-
शोभायात्रा भीष्म साहनी जी की कहानियों का संग्रह है जिसमें 11 कहानियां संकलित हैं। इन कहानियों के शीर्षक हैं- निमित्त, खिलौने, मेड इन इटली, भटकाव, फैसला, रामचंदानी, शोभायात्रा, धरोहर, लीला नंदलाल की, अनूठे साक्षात, सड़क पर। 
सभी कहानियों में परिवेश और चरित्र बिल्कुल अलग है। हर कहानी का मिजाज अलग है।
खिलौने कहानी आज से काफी समय पहले लिखी गई है, उस समय शायद एकल परिवार का दौर अपनी शैशवावस्था में था । इस कहानी में व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं की बलिवेदी पर संवेदनाओं का बलिदान आज और भी प्रखर हो गया है। खिलौने की जगह अब मोबाइल आ गया है।
सड़क पर खिलौने से विपरीत कथानक पेश करती है जिसमें पारिवारिक जीवन घर की चारदीवारी से रिस कर सड़क पर आ जाता है।
लीला नंदलाल की भारतीय न्यायव्यवस्था पर व्यंग्य है। जिसमें रक्षक ही भक्षक है और भक्षक ने रक्षक का भेष बना लिया है। यह सीमा रेखा आज के समय में और भी धूमिल हो गई है।
शीर्षक कहानी शोभायात्रा व्यवस्था को बनाये रखने के लिए दण्ड की आवश्यकता को परिभाषित करती है कि नीति का पालन करने के लिए यह आवश्यक है। प्रजा को अहिंसा का पाठ पढ़ाने के लिए हिंसा का सहारा लेना पड़ता है तभी बलि रुक पाती है।
सभी कहानियां पाठक को सोचने पर मजबूर भी करती हैं और मानसिक क्षुधा शांत भी करती हैं और जगाती भी हैं।
120 पृष्ठ की प्रस्तुत पुस्तक के प्रकाशक राजकमल पेपरबैक हैं और mrp 125/- है।
#bookhubb #booksreview

Monday, February 21, 2022

सुरेश वशिष्ठ : रक्तबीज

 रक्तबीज, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सुरेश वशिष्ठ जी का कहानी संग्रह है। इस कथा संग्रह में 51 कहानियां हैं और अंत में हरियाणा के प्रमुख साहित्यकार श्री राजकुमार निजात की समीक्षा है।

रक्तबीज-सुरेश वशिष्ठ

रक्तबीज की कहानियों में भारत, हिंदुस्तान और इंडिया के द्वंद्व, संदेह और सवाल अत्यंत मुखर हो कर उपस्थित हैं। कहानियों के पात्र हमारे आसपास के परिवेश से सामने आते हैं और अपनी कहानी हमें सुनाते हैं और फिर मस्तिष्क और हृदय के कोने में बैठ जाते हैं । फिर वे हमारी मनःस्थिति को भापते हुए कई देर तक विचरते रहते हैं।

सभी कहानियों में मन और मस्तिष्क को उद्वेलित करने की पर्याप्त क्षमता है। सुरेश वशिष्ठ जी के कथा परिवेश में भारतीय समाज के सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक संक्रमण काल के प्रश्न सजीव हो उठते हैं। 'संस्कार' कहानी जहां पर एक विधुर की मनोदशा का वर्णन करती है वहीं पर 'सलीका' जिंदगी को समझौते की डगर पर डगमगाते हुए दिखाती है। 'रक्तबीज' जैसी कहानियों में धार्मिक मतान्धता को उसके नग्न स्वरूप में डॉ सुरेश वशिष्ठ पूरी तरह से सफल रहे हैं।

2021 में गणपति बुक सेंटर, गाजियाबाद से प्रकाशित इस संग्रह में 112 पृष्ठ हैं और विक्रय मूल्य 80 रुपये है । 

रक्तबीज


Wednesday, February 16, 2022

तर्पण : शिवमूर्ति

उपन्यास : तर्पण

उपन्यासकार : शिवमूर्ति

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली ।

मूल्य : 150/-

पृष्ठ संख्या : 114

आवरण चित्र : डॉ लाल रत्नाकर 

तर्पण : शिवमूर्ति


 आवरण पृष्ठ से :

तर्पण भारतीय समाज में सहस्त्राब्दियों से शोषित, दलित और उत्पीड़ित समुदाय के प्रतिरोध एवं परिवर्तन की कथा है । इसमें एक तरफ कई कई हजार वर्षों के दुख अभाव और अत्याचार का सनातन यथार्थ है तो दूसरी तरफ दलित चेतना के स्वप्न, संघर्ष और मुक्ति की वास्तविकता ।

इस नई वास्तविकता के मानदंड भी नए हैं, पैंतरे भी नए हैं और अवक्षेपण भी नए हैं।

तर्पण कथा :

मुख्य कथा वर्ण-संघर्ष-सवर्ण बनाम दलित की है जिसका आरंभ दो परिवारों- धरमू पंडित बनाम पियारे चमार के संघर्ष से होता है । गाँव के अधिसंख्यक दलित पियारे सहित सवर्णों के खेतों में मजदूरी करते रहे हैं और पिछले दिनों मजदूरी बढ़ाने का सफल आंदोलन कर चुके हैं। अतः वर्ग-संघर्ष मुख्य कथा की पृष्ठभूमि में है । उपन्यास के पात्रों के व्यवहार में इसकी सफलता- असफलता की प्रतिक्रिया भी झलकती है ।

पियारे की विवाहित बेटी रजपतिया घात लगाए बैठे धरमू पंडित के बेटे चंदर द्वारा मटर के खेत में पकड़ ली जाती है- आरोप मटर की चोरी का है- नीयत बदमाशी की है जिसके बारे में आगे चलकर पंडिताइन का कहना है कि यह नीयत वंशानुगत है और जिसके बारे में यह स्थापित है कि चंदरवा का चरित्तर तो अब तक दो तीन बच्चों की माँ बन चुकी गाँव की लड़कियाँ तब से बखानती आ रही हैं जब वह इन बातों का मतलब भी ठीक से समझने लायक नहीं हुई थी।पकड़ी गई रजपतिया के प्रतिकार से प्रथमतः चंदर का अहं आहत होता है नान्हों की छोकरियाँखबरदार बोलना कब से सीख गई ? फिर परेमा की माई, मिस्त्री बहू व रजपतिया की संयुक्त शक्ति से भयभीत हो भाग छूटता चंदर पुरूषोत्तम अग्रवाल की बिल्ली और कबूतरकविता की याद दिलाता है जिसमें कबूतर की खुली आँख की तेज चमक से बिल्ली घबरा जाती है, चकरा जाती है । 

यह मामूली सी और लगभग स्वीकार्य समझी जाने वाली घटना दलितों की अब तक की संचित पीड़ा को विस्फोटक क्रोध में बदल देती है । दलित सामाजिक कार्यकर्ता भाईजी की अगुवाई में दलित युवा पीढ़ी रजपतिया के साथ हुई छेड़छाड़ को बलात्कार की शिकायत में तब्दील कर थाने में दर्ज कराने पर आमादा है क्योंकि भाईजी के मुताबिक ‘366 बटा 511 दर्ज हुई तो इन्क्वायरी अफसर उसे गिराकर 354 पर ले आएगा अतः चंदर को सजा दिलाने के लिए 376 लगाना जरूरी है इसलिए स्ट्रेटेजी बनाना होगा, लिखाना होगा-रेप हुआ है।

पियारे की असहमति; जो कि असत्य भाषण के संभावित पाय जन्मी है और रजपतिया, रजपतिया की माँ-यानी स्त्री की राय जाने बगैर बलात्कार की शिकायत दर्ज होती है- इस संदर्भ में आगे चलकर हरिजन एक्ट का इस्तेमाल किया जाता है ।

धरमू पंडित के पास पैसा है, ऊँचे रसूख हैं, दलित उभार से आहत अहं है तो दलित समुदाय के पास चंदे का, दलित एम.एल.ए. का, रजपतिया से जबरन दिलवाए गए झूठे बयान का सहारा है । पंडित-पुत्र चंदर महाशय रिश्वत के बल पर पहली बार थाने से छूटकर घर आते हैं तो विजय-दर्प में कंधे पर बंदूक टांगकर चमरौटी के तीन चक्कर लगाते हैं ।

भाईजी की कोशिशों से चंदर की फिर गिरफ्तारी होती है तो उसके डेढ़ महीने के जेल-वास के उपलक्ष्य में चमरौटी में सूअर कटता है, दारू चलती है- झमाझम नाच होता है जिसके चलते रजपतिया के भाई मुन्ना पर हजार रूपये का कर्ज हो जाता है । पंडित पार्टी महँगा वकील खड़ा करती है तो दलित पार्टी भी पीछे नहीं । कुल मिलाकर दोनों तरफ नीति नहीं-सिर्फ रणनीति है ।

चूंकि बलात्कार की रिपोर्ट झूठी है और सी.ओ. ठाकुर हैं, चंदर की माता श्री पंडिताइन द्वारा प्रति पचास रू. खरीदी गई निजी हलवाहिन लवंगलता व उसकी बटन कौरह के झूठे बयान हैं; अतः अन्ततः चंदर बरी हो जाता है पर प्रतिशोध भावना से बरी नहीं है सो बंदूक से हवाई फायर करने, भाईजी को डराने के इरादे से निकलता है पर बदले में मुन्ना के हाथों नाक कटा बैठता है ।

इस घटना का न कोई गवाह है न कोई नामजद आरोपी, शक जरूर मुन्ना पर है । ऐसे में मुन्ना का पिता पियारे स्वयं को आरोपी के रूप में अपने वकील को से यह कहकर गिरफ्तार करवाता है कि यह सही है कि मैंने नहीं मारा पर मन ही मन न जाने कितनी बार मारा है । अब जब बिना मारे ही जसलेने का मौका मिल रहा है तो आप कहते हैं इंकार कर दूँ ?

मेरी बात:  

तर्पण मात्र 114 पेज का उपन्यास है लेकिन सदियों का दर्द अपने अंदर समेटे और आने वाली सदियों का डर अपने अंदर समेटे हुए। 

जहां एक तरफ राजपति, पियारे और विक्रम का व्यवस्था के प्रति मानसिक और शारीरिक विद्रोह है तो दूसरी तरफ धरमू पंडित, चंदर की सामाजिक श्रेष्ठता को बरकरार रखने की जद्दोजहद का भी बेबाकी से चित्रण है। 

इनके बीच में भाई जी जैसे चरित्र जो पुरानी व्वयस्था को उखाड़ कर एक नई व्यवस्था स्थापित करने को बेकरार हैं जिसमें खुद को प्रासंगिक साबित किया जा सके। 

शिव मूर्ति जी ने शोषित और शोषक के बदलते समीकरणों का तटस्थ और ईमानदारी से  चित्रण किया है ।

हालांकि तर्पणशिवमूर्ति का दूसरा ही उपन्यास है लेकिन इतना कम लिखकर भी उन्हें जबर्दस्त ख्याति मिली है जो किसी विरले लेखक के नसीब में होती है

तर्पण में नब्बे के दशक के उपरान्त ग्रामीण जनजीवन-स्थितियों के सहारे हमारे समाज के ज्वलंत सच को रेखांकित किया गया है। इस उपन्यास में सदियों से पोषित हिन्दू समाज की वर्ण व्यवस्था से जुड़ी मानसिकता के विरोधी स्वरों के तानों-बानों से पूरा औपन्यासिक ढ़ांचा खड़ा किया गया है।

शिवमूर्ति का तीसरा उपन्यास ‘‘आखीरी छलांग’’ किसान जवीन के त्रासदी को जिस मार्मिकता से उभारती है, वो पाठक को किसान जीवन के दर्द से सीधे लेजाकर जोड़ देती है। 

शिवमूर्ति का प्रत्येक उपन्यास अपने समय-समाज से संवाद करता हुआ अपने समकाल को रचता है तथा अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज करता है। शिवमूर्ति का कथासाहित्य अपने औपन्यासिक ढ़ांचे में हमारे समय-समाज के परस्पर अंतर्विरोधी स्वरों को उसकी संश्लिष्टता में रखते हुए हमारे समय-समाज के करीब लाता है।

तर्पण अपने समय-समाज के संकटों-जातिवाद, धार्मिक, कट्टरतावाद, संप्रदायवाद, वर्चस्ववाद आदि का प्रत्याखान करता हुआ हमें यह सोचने को विवश करता है कि हमारा समाज किस ओर जा रहा है। यही इन उपन्यासों की सार्थकता भी है ।

 

 


Monday, February 14, 2022

प्रेत लेखन : योगेश मित्तल

 
पुस्तक : प्रेत लेखन (हिन्दी पल्प फिक्शन में प्रेत लेखन का नंगा सच)
लेखक : योगेश मित्तल
प्रकाशक : नीलम जासूस कार्यालय, रोहिणी, दिल्ली
पृष्ठ संख्या : 268
MRP : 275/-
Amazon link :  प्रेत लेखन

pret lekhan
प्रेत लेखन

 हिन्दी पल्प फिक्शन में प्रेत लेखन का नंगा सच या संक्षेप में प्रेत लेखन श्री योगेश मित्तल द्वारा लिखी गई अपने आप में एक अनूठी किताब है जिसे नीलम जासूस कार्यालय द्वारा प्रकाशित किया गया है।
प्रेत लेखन का शीर्षक एक कौतूहल जगाता है कि किताब में आखिर मिलेगा क्या ? किसी प्रेत द्वारा किया लेखन ? जी नहीं, ये किताब घोस्ट राइटिंग से संबंध रखती हुई किताब है ।
आप समझते ही होंगे कि घोस्ट राइटिंग या प्रेत लेखन किसी स्थापित लेखक के नाम से या किसी नकली नाम के पीछे रहकर किया गया लेखन है जिसमे असली लेखक की पहचान पढ़ने वालों के सामने नहीं आ पाती है । ऐसे लेखक को घोस्ट रायटर या प्रेत लेखक कहते हैं ।
योगेश मित्तल जी ने अपनी ज़िंदगी के गुजरे दिनों को याद करते हुए, आत्मकथात्मक अंदाज में, 1963 के आसपास का समय अपनी पुस्तक में शुरू से लिया है और अपने लेखकीय जीवन की यादों को एक सूत्र में पिरोया है ।

योगेश मित्तल 


जैसे जैसे हम इस किताब को पढ़ते हैं तो हैरान होते चले जाते हैं कि प्रेत लेखन की सोच या लालच किस कदर उस वक्त के प्रकाशकों और लेखकों पर हावी हो गई थी कि हर कोई इसमें कूदना चाहता था ।
जहां तक मैं समझ पाया हूँ कि हिन्द पॉकेट बुक्स से कर्नल रंजीत के नाम से उपन्यास निकले और उनकी सफलता ने सभी प्रकाशकों को ध्यान खीचा ।  जनप्रिय ओम प्रकाश शर्मा और श्री वेद प्रकाश कम्बोज के नाम से नकली लेखन शायद उस वक्त उनकी प्रसिद्धि को दर्शाता है । लेकिन इस प्रेत लेखन का खामियाजा आखिरकार उन्हें भी भुगतना पड़ा ।
योगेश मित्तल जी का रुझान इस प्रेत लेखन में क्यों था या वो इसे कैसे स्वीकार कर पाये – इस बात का जवाब हमें उन्हीं के जुबानी मिलता है – “मैं खामोश रह गया तथा यही सोचा – सामाजिक और जासूसी उपन्यासों में अगर नाम नहीं छपता, न छपे। पैसे तो मिल रहें हैं । नाम के लिए कभी कुछ साहित्यिक लिखेंगे।
इस किताब की नीव या शुरुआत फ़ेसबुक पर राजभारती के फ़ैन पेज पर साझा किए गए संस्मरणों से हुई थी जो लोगों को बहुत पसंद आए थे । जिसे मैंने भी पढ़ा था । उसी वक्त इन संस्मरणों को एक किताब के रूप छापने की मांग शुरू हो गई थी जिसे आखिरकार नीलम जासूस कार्यालय ने साकार किया ।
पल्प फिक्शन के सुनहरी दौर में रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड पर बुक-स्टाल पर हमने कहीं न कहीं मनोज, सूरज, धीरज, रानु, राजवंश, कर्नल रंजीत या मेजर बलवंत के उपन्यास जरूर देखें होंगे । ये सिर्फ काल्पनिक नाम थे और इनके पीछे थे – मख़मूर जालंधरी, फारुख अर्गली, आरिफ़ म्हारवी, केवल कृशन कालिया, हादी हसन और योगेश मित्तल ।
पूरी किताब उस वक्त के रोचक किस्सों से भरी हुई है । जो लोग उस दौर से पाठक के तौर पर गुजरे हैं, उनके लिए उस दौर के लेखन जगत की बातों को जानना एक अनूठा अनुभव होगा, जिसके बारे में यहाँ वहाँ से बात उठती रहती थी । योगेश मित्तल जी ने लगभग पूरा सच पाठकों के सामने रखा है । उनकी याददाश्त का लोहा मानना पड़ेगा जिसके दम पर उन्होंने प्रत्येक दृश्य पाठकों के सामने साकार कर दिया है ।
पुस्तक की साज-सज्जा काबिले तारीफ है । आवरण पृष्ठ का डिजाइन नीलम जासूस कार्यालय का सबल पक्ष रहा है जिसमें पूरे नंबर दिये जा सकते हैं । पेपर क्वालिटी और बाइंडिंग उम्दा दर्जे की है जो पाठकों को आकर्षित करती है ।
पुस्तक की शुरुआत में लगभग पचास पेज में भूमिका/ प्रशस्ति लेखन है जिसे कम किया जा सकता था । यही पेज योगेश मित्तल जी को दिये जा सकते थे जिसमें वे अपनी यादों को थोड़ा और विस्तार दे सकते थे जिससे पढ़ने वालों को शायद ज्यादा लुत्फ आता । अंत में ऐसा लगता है जैसे किताब को जल्दी समेट दिया गया हो ।
इस सबके बावजूद प्रेत लेखन एक संग्रहणीय पुस्तक है जिसे लोकप्रिय साहित्य को चाहने वाला अपने पास जरूर रखना चाहेगा ।
इस पुस्तक के बाद योगेश मित्तल जी ने इसी पुस्तक में आगे भी गुफ्तगू जारी रखने का जिक्र किया है जिसमें कई और लेखकों के बारे में संस्मरण आने है । यह सब भविष्य के गर्भ में है लेकिन पाठकों को बेसब्री से इंतजार रहेगा और मुझे भी ।  
© Jitender Nath



      
 

Friday, February 4, 2022

मृत्युंजय - शिवाजी सावन्त (समीक्षा - डॉ वसुधा मिश्रा)

उपन्यास : मृत्युंजय
लेखक : शिवाजी सावन्त
समीक्षा : डॉ वसुधा मिश्रा

हाथ कांपते है ,दिल की धमक कुछ तेज सी होने लगती है जब कलम उठाने की कोशिश करती हूं,ऐसे महाशास्त्र के विषय में कुछ भी लिखने के लिए ...
   पर कोशिश तो करनी ही होगी क्योंकि ऐसे अधूरा रह जायेगा मेरा आभार प्रकट करना उस महान कलमकार को जिसने अपनी लेखनी से अमृत बिखेर दिया ,हम सभी की जिंदगी में ...
ये उपन्यास मूलतः मराठी भाषा में लिखा , शिवाजी सावंत ने..
14 वर्ष की कोमल  किशोर अवस्था में जब बालक खेलकूद में अपना समय व्यतीत करते हैं , उस वक्त उन्होंने कृष्ण का पात्र निभाते हुए एक नाटक खेला,पर जिया पूरी तरह से "कर्ण" के
पात्र को ,घर कर गया कर्ण का चरित्र उनके मन मस्तिष्क पर , इतनी गहरी नींव पड़ी उसकी कि उसी नींव पर एक विशाल ,महान इमारत खड़ी की उन्होंने जिसको आज तक कोई हिला नही पाया ...
पहले एक नाटक लिखने की योजना बनाई उन्होंने ,पर ऐसा लगा कि न्याय नहीं कर पायेंगे,इतने  विस्तृत व्यक्तित्व का ,चित्र नही खींच पाए वो पूरी तरह से .....
उन्हें महाभारत का ज्ञान था ही, साथ  ही दिनकर की " रश्मिरथी " और केदारनाथ मिश्र की " प्रभात " ने पूरा महाग्रंथ लिखने के लिए प्रेरित किया ...
1967 में मराठी में इसका प्रथम संस्करण निकला , लोगों में एक बिजली सी दौड़ गई ,एक लहर ऐसे उठी की मानो आकाश छू लेगी। 
शिवाजी सावंत ने कर्ण का चरित्र इतना ओजस्वी ,इतना औदार्यपूर्ण ,इतना महावीर , दीनरक्षक और दिव्य प्रस्तुत किया है जिसके सामने महाभारत के अन्य पात्र ऐसे प्रतीत होने लगे जैसे सूर्य अपनी चमक से सारे अन्य प्रकाश धूमिल होते नज़र आने लगते हैं ।
इस उपन्यास की भाषा शैली ,  पृष्ठभूमि पर इतनी सूक्ष्म पकड़, चारित्रिक संकल्पना इतनी सधी हुई जैसे कोई तीर  पारंगत धनुर्धर अपने  तूणीर से छोड़ता है और वो सीधे लक्ष्य पर लगता हैं ।
ऐसा महाकाव्य रचा गया कि जिसके जैसा मार्मिक और सत्याभिवक्ति करने वाला अन्य कुछ इसके सामने नही टिकता ।
इस उपन्यास में कर्ण,कुंती ,दुर्योधन , वृषाली( कर्ण की पत्नी ) ,शोण, और कृष्ण के आत्मकथ्यों के माध्यम से घटनाओं को वर्णित किया गया है ।
कर्ण की आत्मकथा जैसे शुरू होता है ये उपन्यास जहां कर्ण की हर संभव यह कोशिश है कि वह अपने जीवन के तरकश को  अच्छी  तरह खोल कर दिखा सके,जिसमे अनेक आकारों की विविध घटनाओं के बाण ठसाठस भरे हुए हैं...
वो अपने व्यक्तित्व के हर आयाम को सबके सामने ऐसे रख देना चाहता है, कोई छुपाव - दुराव नही हो जिसमें ..
उसके मन की व्यथा उससे कहती है कि "कर्ण! कहो ...अपनी जीवन - कथा ,ऐसे कि सब समझ सके कि तेरा जीवन चीथड़े के समान नहीं था,वरन वह तो गोटा लगा हुआ एक अतलसी राजवस्त्र था,परिस्थितियों के निर्दयी बाणों से उसके सहस्र चीथड़े हो गए थे,और जिसके हाथ में पड़े,उसने मनमाने ढंग से उनका प्रचार किया ...."
कथा की शुरुआत चंपानगरी से होती है जहां कर्ण का बचपन अपने पालक माता पिता ,राधा और अधिरथ के पुत्र के रूप में बीत रहा था ,उसका एक छोटा भाई भी था जिसका नाम शोण था,उपन्यास में कर्ण के बचपन का काफी विस्तार से वर्णन किया गया है ,उसके बचपन की हर छोटी बड़ी घटना को बड़े ही मार्मिक चित्रण से सजाया है ,पढ़ने पर हम उसको स्वयं अनुभव करते हैं कि कर्ण का बालपन  किन किन असमंजस से भरे प्रश्नों की अनबूझ पहेली जैसा रहा है , जिनका जवाब न उसके पास था न ही कोई ऐसा था जिससे वो अपने सवालों के उत्तर पा सके...
आगे उसका शास्त्र और शस्त्र विद्या सीखने के लिए हस्तिनापुर जाना ,वहां सभी विषयों में,विद्याओं में दक्ष, सर्वश्रेष्ठ होने के बावजूद भी उसकी जाति के कारण उसको उचित सम्मान और स्थान न मिलना बल्कि उपेक्षा,घृणा और अपमान से हर कदम उसका सामना होना ,
चाहे वो द्रोणाचार्य के द्वारा मिला हुआ धिक्कार हो या द्रौपदी के द्वारा अपने स्वयंवर में मिला हुआ तिरस्कार हो ,या माता कुंती द्वारा पैदा होते ही त्याग दिए जाने को असह्य पीड़ा हो ,या भीष्म पितामह द्वारा उसको कभी भी एक सम्मानित नागरिक तक न माने जाने का आत्मिक संताप हो .....
कर्ण का जीवन इन सभी दंशो के साथ भी ,अपने ऊर्जित ,गर्वित और पौरुष से भरे हुए मस्तक के साथ सदैव ऊंचे रहने में ही प्रयत्नशील रहा ..
जब भरी युद्धशाला में द्रोण के द्वारा अपमानित किए जाने पर ,दुर्योधन सामने आता है ,मैत्री भाव लेकर ( भले ही उसका वह प्रस्ताव ,स्वार्थ पूर्ति के लिए ही था) और कर्ण को "अंगराज" की उपाधि से अलंकृत कर सम्मान के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठा देता है , उस उपकार का बदला कर्ण अपनी मृत्यु तक चुकाता है ,कहां होगा ऐसा साक्षात उदाहरण मैत्री का , कर्ण के जीवन के सिवा ....
अनेकों अनेक प्रसंग ऐसे हैं जो आपकी आत्मा को झकझोर देते हैं,कचोटते है कर्ण के कष्ट हमें भी ,आखिर कर्ण के साथ ऐसा क्यों हुआ ????इतनी परीक्षा उसकी ,हर कदम पर ,हर बार जब वो जीत के एकदम निकट होता है ,उससे छीन लिया जाता है जीत का परचम और थमा दिया जाता है ,निकृष्ट जाति के होने का एक परिचय पत्र..........
कर्ण का हृदय सहमता नही ,डरता नहीं ,द्रवित होता है और चाहता है अपने हर प्रश्न का जवाब ...उठ खड़ा होता है वो हर आगे वाली चुनौती के लिए अपने पास सुरक्षित हर विराट शक्ति के साथ ,दोगुनी ,चार गुनी क्षमताओं को साथ लेकर ..
कर्ण के विशाल व्यक्तित्व का एक उदाहरण मिलता है जब श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध के निकट आने के समय राजकाज और शिष्टता की पूंजी साथ लेकर हस्तिनापुर जाते हैं और समझौते का प्रस्ताव रखते हैं,दुर्योधन उसको ठुकरा देता है और युद्ध की घोषणा हो जाती है, उस वक्त हस्तिनापुर से वापस जाते समय मात्र कर्ण ही ऐसा व्यक्ति होता है जिसका हाथ पकड़ कर कृष्ण अपने रथ में चढ़ा लेते हैं,उसको उसके जन्म का सम्पूर्ण रहस्य बताते हैं, उस चिरप्रतीक्षित सत्य को जानने के बाद भी ,उसका अपने वचन और स्नेहभाव दुर्योधन के लिए ही रखते हुए कौरवों का साथ देने के रहते कृष्ण का प्रस्ताव अस्वीकार करता है .....
उपन्यास ओत प्रोत है ऐसे हजारों, हृदय को प्रकंपित कर देने वाले प्रसंगों से ,उनको स्वयं पढ़कर उनकी अनुभूति करने का आनंद अवर्णनीय है ...
मेरी आंखों में आंसुओ की बूंदे लाने वाले प्रसंगों में से एक है - अर्घ्यदान के समय गंगातट पर "कर्ण - कुंती की भेंट ,इतना हृदयविदारक संस्मरण है वो ,शायद विश्व में माता - पुत्र के रिश्ते का इतना गहरा और बेमिसाल वर्णन कहीं और नही मिलेगा , अपने उस अस्तित्व के सत्य को जानने के लिए कर्ण को लगभग 75 साल घुटन,अपमान और घृणा झेलते हुए बिताने पड़े ,
वो प्रसंग आपका दिल जरूर द्रवित करेगा .....एक एक शब्द आत्मसात करने वाला है ।
कर्ण के परमदानी होने का परिचय देता हुआ अंश जहां वो इंद्र को अपने कवच और कुंडल सहर्ष उतार कर दे देता है , या परशुराम जी द्वारा शापित होकर ऐन वक्त पर ब्रह्मास्त्र का उपयोग न कर पाने का परम दुख सहन करके भी पथभ्रष्ट न होना ,अपने वचन पर टिके रहकर अपने सर्वस्व का बलिदान दे देना ,सिर्फ कर्ण का पराक्रम ही कर दिखा सकता था ....
सारा कुछ न लिख पाने की कुछ मेरी मजबूरी है ,एक तो इस महाकाव्य रूपी सागर को मैं अपनी लेखनी की गागर में भरने की सिर्फ एक कोशिश मात्र कर सकती हूं ,जो मैने की है ....दूसरा ये कि मैं चाहती हूं ....दिल से .. कि यहां सभी अच्छा पढ़ने वाले लोग इस महाग्रंथ को अपने जीवन में अवश्य ,अवश्य पढ़ें ,..कई बार पढ़ सके तो कई बार वरना एक बार तो अवश्य ही पढ़ें ...और स्वयं साहित्य सरिता में गोते लगाएं और साक्षी बने इस महान कलाकृति के .....
पढ़कर परिचित होइए एक अडिग, अशरण, अंगराज दिग्विजयी,दानवीर, राधेय,कौंतेय , सूर्यपुत्र,सही अर्थों में ज्येष्ठ और श्रेष्ठ पांडव ,कर्ण से ,जिसको एक सीमित क्षेत्र में बांधना अति दुरूह कार्य है।

"दुस्साहस था कि वह पहुंचा ,राजरंगशाला में ।
चमके जैसा कमल चमकता ,कनक किरणमाला में ।।"
कर्ण के सुवर्ण का वर्णन खुद महसूस कीजिए।
निवेदन है आप सबसे।।🙏🙏🙏

नाम - मृत्युंजय
लेखक - शिवाजी सावंत (मूलतः मराठी में)
अनुवाद - ओम शिवराज ( अनुपम अनुवाद - कोटिशः 
नमन )
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ 
ISBN- 9789326350617
मूल्य - 399रुपए 

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